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असुरक्षित स्त्री

लड़की ने अपहरण के प्रयास के तहत रिपोर्ट दर्ज करानी चाही लेकिन पुलिस ने सिर्फ छेड़खानी का मामला दर्ज किया। इससे मामला कमजोर पड़ गया और आरोपी को जमानत मिल गई जबकि अपहरण के केस में उसे जमानत नहीं मिलती।

Author August 16, 2017 6:31 AM
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हरियाणा इकाई के अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे को आईएएस अधिकारी की बेटी का पीछा करने के आरोप में गिरफ्तार किया और उसके बाद उन्हें बेल पर छोड़ दिया गया। (फाइल फोटो)

चंडीगढ़ में एक आइएएस अफसर की बेटी ने साहस दिखाते हुए अपने साथ हुई वारदात की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। इस तरह पीछा और भद्दी टिप्पणियां किया जाना एक भारतीय लड़की का रोजमर्रा का अनुभव है और उसे इस तरह के मामलों को अनसुना करने की हिदायत दी जाती है। पुलिस के पास जाने से आम नागरिक कतराता है और वजह है उसका असहयोग और उदासीन रवैया। चंडीगढ़ के मामले में भी पुलिस ने दबाव के चलते कार्रवाई में शिथिलता बरती। वास्तव में पुलिस अक्सर सही धारा में केस नहीं दर्ज करती। उसकी रिपोर्ट में सारे खेल छुपे होते हैं। लड़की ने अपहरण के प्रयास के तहत रिपोर्ट दर्ज करानी चाही लेकिन पुलिस ने सिर्फ छेड़खानी का मामला दर्ज किया। इससे मामला कमजोर पड़ गया और आरोपी को जमानत मिल गई जबकि अपहरण के केस में उसे जमानत नहीं मिलती। पुलिस को कई सीसीटीवी भी फुटेज भी नहीं मिलीं।

पुलिस की इसी तरह की गतिविधियों के चलते समाज में उसकी छवि खराब हुई है। पुलिस सुधार के लिए बनी कई समितियों ने कहा है कि उसे राजनीतिक दवाब में काम नहीं करना चाहिए। यहां जान लेना उचित है कि पुलिस राजनीतिक दबाव में काम क्यों करती है? उत्तर है कि पुलिस अधिकारियों के कार्यकाल की कोई निश्चित सुरक्षा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पुलिस सुधार पर चर्चित मामले प्रकाश सिंह में इस दिशा में कई महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए थे जिनका अनुपालन नहीं किया गया।

किसी भी देश की प्रगति के लिए जरूरी है कि वहां सभी तरह की गतिविधियों में महिलाओं की समान भागीदारी बढ़े। भारत का मानव विकास सूचकांक या वैश्विक लैंगिक अनुपात सूचकांक में बेहद निम्न स्थान है। इसका बड़ा कारण यहां महिलाओं की सुरक्षा की लचर स्थिति है। केवल आर्थिक विकास भारत के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है। सरकार को सामाजिक विकास पर भी ध्यान देना होगा। महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाओं में ही नहीं बल्कि सभी घटनाओं में जहां न्याय की अवहेलना होती हो, सक्रिय भूमिका निभानी होगी। समाज में ऐसी घटनाएं न हों, यह केवल पुलिस या सरकार का दायित्व नहीं है। आमजन को भी अपनी परंपरागत सोच में बदलाव लाना होगा। हमें पितृसत्तात्मक सोच से निकलना होगा। महिलाओं के लिए समान अधिकारों की बात करनी होगी।
’आशीष कुमार, उन्नाव, उत्तर प्रदेश
किसे परवाह

पिछले दिनों देश में लगभग बीस स्वच्छताकर्मियों की मृत्यु सीवर साफ करते समय हुई पर यह समाचार न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और न प्रिंट मीडिया की सुर्खी बन सका। जब समाज को राष्ट्रभक्ति, वंदेमातरम, बकरा ऐप, गुजरात राज्यसभा चुनाव आदि-आदि समाचारों को मिर्च-मसाला लगा कर उलझाया जा सकता हो तब वास्तविक मुद्दे कहां ठहरते हैं!
सभ्य समाज और सरकार के लिए क्या यह शर्मनाक नहीं कि आज भी कुछ इंसान अपनी आजीविका के लिए ऐसे माहौल में कार्य कर रहे हैं जहां अन्य लोग कुछ क्षण भी खड़े नहीं रह सकते। यह समस्या आज के वैज्ञानिक युग में उपकरणों के प्रयोग और सही प्रबंधन से हल हो सकती है। पर जब समाज को आधारहीन मुद्दों पर उलझा-लड़ा कर मजे से शासन किया जा सकता हो तब अंतिम छोर पर खड़े लोगों की सुध लेना किसे जरूरी लगेगा?
’मधुर मोहन मिश्र, अनंतपुर, रीवा

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