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वैकल्पिक राजनीति

भारत में जब कभी भी कुछ अप्रत्याशित या चकित करने वाली घटना घटती है तो मुझे बीबीसी के लोकप्रिय पत्रकार मार्क टली की किताब ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ की याद आती है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सबको चौंकाया और विशेषज्ञों के चुनाव-पूर्व अनुमानों, राजनीतिक पार्टियों के आकलनों और एक्जिट पोल के तमाम […]

Author February 18, 2015 1:10 PM

भारत में जब कभी भी कुछ अप्रत्याशित या चकित करने वाली घटना घटती है तो मुझे बीबीसी के लोकप्रिय पत्रकार मार्क टली की किताब ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ की याद आती है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सबको चौंकाया और विशेषज्ञों के चुनाव-पूर्व अनुमानों, राजनीतिक पार्टियों के आकलनों और एक्जिट पोल के तमाम सर्वेक्षणों तक को झूठा साबित कर आम आदमी पार्टी को 70 में से 67, यानी 95 प्रतिशत सीटों पर विजयी घोषित किया है। मार्क टली की इस किताब का निचोड़ यही है कि भारत में कुछ भी- अप्रत्याशित, असंभव और अकल्पनीय, हो सकता है। मुझे वर्षों पहले विश्व युवक केंद्र में आयोजित एक सम्मेलन में आयोजक संस्था के अध्यक्ष और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री दिवंगत प्रमोद महाजन की यह बात भी याद आ रही है कि ‘इन दिनों जनता सरकारों के साथ ऐसे खेल रही है, जिस तरह बच्चे खिलौनों के साथ खेलते हैं।’

एक दिन मैं उत्तराखंड के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षण केंद्र चला रही महिला कार्यकर्ताओं के अनुभव सुन रहा था। उनमें से तीन-चार ने कहा कि किरण बेदी पर जो किताब है उसे बहुत ज्यादा लड़कियां और किशोरियां पढ़ रही हैं, इतनी ज्यादा मांग है कि वह पुस्तकालय में रहती ही नहीं। दोपहर के समय कमरे से बाहर आते ही यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि उनके नेतृत्व में लड़े गए चुनाव में भाजपा सिर्फ तीन सीटें जीत पाई। मैं बचपन से, जब हमारे घरों में टीवी तक नहीं था, किरण बेदी के बारे में सुनता-पढ़ता आया हूं। भारतीय पुलिस सेवा में आने वाली भारत की पहली महिला होने से लेकर दिल्ली यातायात पुलिस में उनकी कड़क छवि, उनकी ईमानदारी और तिहाड़ जेल में कैदियों के सुधार के सराहनीय कामों के लिए उनका बड़ा नाम रहा है। राजनीति में पदार्पण करते ही उन्हें इतना जोरदार झटका लगा और जीवन भर सार्वजनिक सेवा में कमाया नाम चुनाव में उनके किसी काम नहीं आया।

मोदी लहर का क्या हुआ? ‘मन की बात’ का आगामी संबोधन इस हार पर ही क्यों न सही? सिने अभिनेता और भाजपा के नेता शत्रुघ्न सिन्हा की बिहार के चारा घोटाले के संदर्भ में लालू के लिए कही पुरानी बात भी मुझे याद है कि ‘यदि ताली कप्तान को तो गाली भी कप्तान को।’ मोदी दिल्ली चुनाव में भाजपा का चेहरा थे और उन्होंने इतनी सारी चुनाव सभाएं भी कीं। कुछ ही महीने पहले लोकसभा चुनाव में दिल्ली में भाजपा ने भारी सफलता पाई थी। मोदी के विरुद्ध जनाक्रोश भी नहीं समझ में आता, हालांकि काले धन को वापस लाने का वायदा सरकार ने पूरा नहीं किया और जन-विरोधी और उद्योगपतियों को मदद करने वाला भूमि अध्यादेश लेकर आए। उनका अहंकार और हाल में दिखाया गया दस लखिया सूट भी लोगों को बुरा लगना उचित है। लेकिन तब भी इतनी दुर्गति तो नहीं होनी थी।

कांग्रेस का प्रदर्शन निरंतर गिरता ही जा रहा था, लेकिन दिल्ली में 15 साल राज करने वाली, भारत की 130 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी को शून्य सीट मिलना उसके लिए तगड़ा झटका है। हैरानी इस बात से होती है कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी टस से मस नहीं होते। प्रधानमंत्री पद को ठुकराने की मिसाल सामने रखने वाली सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद को छोड़ने को क्यों तैयार नहीं हैं?

इन सबसे हट कर इन अप्रत्याशित नतीजों को अरविंद केजरीवाल और उनकी आप पार्टी के प्रति दिल्ली के लोगों के भारी समर्थन के रूप में देखा जा सकता है। आशंका थी कि ‘भगोड़ा मुख्यमंत्री’ के रूप में उनकी बदनाम छवि के कारण और केंद्र में यूपीए की बदनाम सरकार की अपेक्षा अबकी बार मोदी की लोकप्रिय सरकार होने के कारण ‘आप’ को पहले जितनी 28 सीट भी न मिलें। लेकिन इससे 39 सीटें ज्यादा मिल गर्इं। शक्ति-संतुलन की दृष्टि से यह लोकतंत्र के लिए अच्छा होगा। इसके अलावा सबसे बड़ी बात यह कि ये लोग कांग्रेस-भाजपा की परंपरागत राजनीति से हट कर वैकल्पिक, जनाधारित राजनीति की बात करते हैं। यदि ये अपने नेता अरविंद केजरीवाल की अहंकार से बचने की नसीहत को मान कर सच्चे मन से आमजन के हित में प्रयास करते हैं तो दिल्ली की दशा सुधर जाएगी। आम लोग नेताओं को अहंकार और धोखेबाजी के लिए सबक सिखाते हैं, लेकिन गलती के लिए माफ कर देते हैं, ‘भगोड़े’ को भी। दिल्ली के बारे में मेरी धारणा थी कि ‘दिल्ली बेदिल है’, लेकिन आप को दिल्लीवासियों के भरपूर समर्थन से पता चला कि सच में दिल्ली दिल वालों की है।

कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा

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