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बहस का पक्ष

टीवी चैनलों पर दिखाई जाने वाली बहसों का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए विचार-मंथन द्वारा जनता के साथ सीधा-सीधा संवाद ताकि श्रोता, दर्शक के ज्ञान में इजाफा हो सके। अन्य प्रकार के विषयों यथा विज्ञान, समाजशास्त्र, पर्यावरण, कला-साहित्य आदि से जुड़ी बहसों में एंकर आत्मपरक हो सकता है। मगर राजनीतिक विषयों और खासतौर पर समसामयिक और […]

Author July 23, 2015 1:43 PM

टीवी चैनलों पर दिखाई जाने वाली बहसों का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए विचार-मंथन द्वारा जनता के साथ सीधा-सीधा संवाद ताकि श्रोता, दर्शक के ज्ञान में इजाफा हो सके। अन्य प्रकार के विषयों यथा विज्ञान, समाजशास्त्र, पर्यावरण, कला-साहित्य आदि से जुड़ी बहसों में एंकर आत्मपरक हो सकता है। मगर राजनीतिक विषयों और खासतौर पर समसामयिक और अति संवेदनशील मुद्दों पर होने वाली बहसों में उसका निष्पक्ष और वस्तुपरक होना अति आवश्यक है। एक बात यह भी जरूरी है कि बहस में जो भी ‘पन्नेलिस्ट’, प्रवक्ता बुलाए जाएं, वे अनिवार्यत: देश की पक्ष और विपक्ष की प्रमुख राजनीतिक विचारधाराओं से संबंध रखने वाले हों। इससे बहस में संतुलन और आकर्षण बना रहेगा।

पैनल बड़ा हो तो सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं को आमंत्रित किया जाना चाहिए। मसलन, अगर पैनल में सात बोलने वाले हैं तो तीन पक्ष से, तीन प्रतिपक्ष से और एक निष्पक्ष (विचारक, पत्रकार, विश्लेषक) होने चाहिए। एक ही विचारधारा के प्रवक्ताओं की बहुलता से बहस का एकपक्षीय अथवा असंतुलित हो जाना स्वाभाविक है!

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एंकर नपी-तुली भाषा में विषय का प्रवर्तन करे, खुद को समय कम दे और विद्वान, विशेषज्ञ- प्रवक्ता को बोलने का समय अधिक दे। बहस के दौरान समय-समय पर असंयत प्रवक्ता की बेवजह और जानबूझ कर ध्यान बंटाने के लिए की जाने वाली टोका-टोकी, अनर्गल बातचीत पर लगाम लगाए, क्योंकि एक बार यह सिलसिला शुरू हो जाता है तो फिर थमता ही नहीं। बहस के दौरान कभी-कभी ऐसा लगता है कि एंकर खुद किसी दल-विशेष का प्रवक्ता बन रहा होता है! यह कोई उम्दा या निष्पक्ष ‘एंकरिंग’ नहीं कहलाएगी। दर्शक, श्रोता एंकर की इस ‘पक्षधरता’ को सब समझता है। इस प्रवृत्ति से भी बचने की सख्त जरूरत है।

सरकार उचित समझे तो टीवी चैनलों पर दिखाई जाने वाली बहसों, खासतौर पर राजनीतिक और देशहित से सीधे-सीधे जुड़ी बहसों- के लिए एक आचार-संहिता जारी कर सकती है, ताकि दर्शकों को एक सार्थक, साफ-सुथरी और ज्ञानवर्द्धक बहस देखने, सुनने को मिल सके।
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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