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मंशा पर सवाल

प्रशासन में पारदर्शिता और लोगों के प्रति जवाबदेही के मकसद से दस साल पहले सूचना के अधिकार का कानून बना था। इस कानून के चलते अनेक अनियमितताओं के खुलासे हुए। नागरिकों को भ्रष्टाचार से लड़ने का एक जरिया मिला। हालांकि कानून का सहारा होने के बावजूद सूचनाधिकार की राह आसान नहीं रही है। अधिकारी आवेदन […]

Author June 16, 2015 3:57 PM

प्रशासन में पारदर्शिता और लोगों के प्रति जवाबदेही के मकसद से दस साल पहले सूचना के अधिकार का कानून बना था। इस कानून के चलते अनेक अनियमितताओं के खुलासे हुए। नागरिकों को भ्रष्टाचार से लड़ने का एक जरिया मिला। हालांकि कानून का सहारा होने के बावजूद सूचनाधिकार की राह आसान नहीं रही है। अधिकारी आवेदन के तहत मांगी गई जानकारी देने में आनाकानी करते रहे हैं। रसूख वाले लोगों पर लगे आरोपों से संबंधित सूचनाएं मांगने वालों को तरह-तरह की धमकियां मिलती हैं। अनेक आरटीआइ कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हुए हैं, कइयों की जान भी गई है। लेकिन अब सूचनाधिकार को लेकर संस्थागत कठिनाइयां भी बढ़ती जा रही हैं। केंद्रीय सूचना आयोग के तीन आयुक्तों के पद एक साल से अधिक समय से रिक्त हैं। नतीजतन, आयोग में लंबित अपीलों की तादाद बढ़ती जा रही है। अपील का निपटारा होने में दो साल से ज्यादा वक्त लग जाना आम बात है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि मोदी सरकार सूचना आयुक्तों का पद खाली रख कर सूचनाधिकार को निष्प्रभावी बनाने में लगी हुई है।

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मोदी सरकार भ्रष्टाचार मिटाने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के वादे पर आई है। सरकार को साल भर होने जा रहा है। केंद्रीय सूचना आयोग के खाली पद क्यों नहीं भरे गए? यूपीए सरकार के दौरान ही कानून बन जाने के बावजूद लोकपाल संस्था का गठन अब तक नहीं हो पाया है। साल भर पहले विसलब्लोअर विधेयक पारित हुआ था, पर संबंधित कानून की अधिसूचना अब तक जारी नहीं हुई है। बहुत-से न्यायाधिकरणों के पद भी समय से नहीं भरे जाते। इस बारे में फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने जवाब तलब भी किया था। केंद्रीय सूचना आयोग के साथ-साथ राज्यों में भी ऐसे आयोग बनाए गए, इस उद््देश्य से कि अगर सरकारी विभाग सूचना देने से इनकार करें, तो इसके खिलाफ अपील की जा सके। लेकिन राज्यों में भी सूचना आयुक्तों के पद रिक्त होने पर समय से नई नियुक्तियां नहीं हो पाती हैं। कई राज्य सरकारों ने अघोषित रूप से सूचनाधिकार कानून के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने की नीति अपना रखी है। लंबित अपीलों की संख्या बढ़ते जाने का एक प्रमुख कारण सरकारी विभागों का रवैया भी है।

सूचनाधिकार अधिनियम की धारा 4 के तहत प्रावधान है कि सरकारी विभाग अपनी वेबसाइट पर सत्रह श्रेणियों की सूचनाएं पेश करेंगे। पर तीन महीने पहले जारी हुई केंद्रीय सूचना आयोग की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्ष केवल पच्चीस फीसद विभागों ने इस प्रावधान का पालन किया। फिर, एक समस्या यह भी है कि सूचना आयोग संसाधन की कमी से जूझते रहते हैं। उनके पास पर्याप्त संख्या में ऐसे कर्मचारी नहीं हैं जो अपने काम में कुशल और संबंधित कानून के जानकार हों। आयुक्तों के पद खाली रहने पर आयोगों की बढ़ी हुई दिक्कतों का अंदाजा लगाया जा सकता है। ये कठिनाइयां आसानी से दूर का जा सकती हैं, बशर्ते केंद्र और राज्य सरकारें इन्हें गंभीरता से लें। अपीलों के बढ़ते बोझ और उनके निपटारे केलिए बरसों इंतजार करने की सूरत में सूचनाधिकार बेमतलब होता जा रहा है। यह स्थिति सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

विनय रंजन, गांधी कॉलोनी, फरीदाबाद

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