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योग का धर्म

आगामी इक्कीस जून को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग दिवस मनाया जाएगा। यह बहुत अच्छी शुरुआत है। बताया जा रहा है कि इस आयोजन में अनेक देशों, यहां तक कि मुसलिम देशों के प्रतिनिधि भी भाग लेंगे। व्यक्ति के जीवन में सुधार के लिए कोई भी आयोजन किया जाए, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। मनुष्य का […]

Author June 17, 2015 5:57 PM

आगामी इक्कीस जून को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग दिवस मनाया जाएगा। यह बहुत अच्छी शुरुआत है। बताया जा रहा है कि इस आयोजन में अनेक देशों, यहां तक कि मुसलिम देशों के प्रतिनिधि भी भाग लेंगे। व्यक्ति के जीवन में सुधार के लिए कोई भी आयोजन किया जाए, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। मनुष्य का शरीर और मन स्वस्थ रहे, इससे अच्छी क्या बात हो सकती है! यदि कोई इस आयोजन का विरोध कर रहा है तो उसे दया का पात्र समझ कर उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए। कोई व्यक्ति स्वस्थ अथवा अस्वस्थ रहना चाहता है यह उसका व्यक्तिगत मामला है।

योग न करने से वह नरक में नहीं जा रहा या वह पाप का भागीदार नहीं हो जाएगा! यह तो अपना-अपना सोच है। अब कोई फूलों के बगीचे में नहीं जा रहा, वह फूलों की सुगंध नहीं लेना चाहता तो यह उसकी मरजी। पर भाजपा के कुछ अति उत्साही नेताओं ने जिस तरह योग को एक पार्टी की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया है और योग जैसे अमृत को हिंदू खांचे में बंद करने की कोशिश की है उससे योग की मूल भावना प्रभावित हुई है। यह मूल उद्देश्य में पलीता लगाने का काम है।

विषय कोई भी हो, कितना ही गंभीर हो, भाजपा के चंद ‘बाबाओं’ का अल्पसंख्यक विरोध का अपना एक एजेंडा रहता है और वे भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर ध्रुवीकरण को आधार बना कर अपनी तथाकथित देशभक्ति प्रकट करते हैं। योगी आदित्यनाथ या उनके जैसे ‘देशभक्तों’ को ऐसा क्यों लगता है कि उनके इन बयानों से देश की जनता खुश होती है? होना तो यह चाहिए था कि आदित्यनाथ अपनी योगमय बुद्धिमता से लोगों को योग के प्रति आकर्षित करते, योग के फायदे बताते, योग की महिमा का गुणगान करते और योग में रुचि पैदा करते। पर उनके बयानों के तीखेपन ने योग जैसी चीज को भी विवादास्पद बना दिया। आदित्यनाथ की नजर में योग क्या है यह तो वे ही जानें पर योग कभी भी तोड़ने की बात नहीं करता। योग तो हमेशा जोड़ने की बात करता है। जोड़ना ही योग का धर्म है।

योग पर किसी का एकाधिकार है। योग का इस्लाम, हिंदुत्व, जैन या ईसाई आदि किसी मत से दूर का भी कोई संबंध नहीं है। योग एक विज्ञान है। योग विश्वास नहीं बल्कि एक प्रायोगिक क्रिया है। यदि स्वास्थ्य के संदर्भ में योग को लें तो यह तन-मन को स्वस्थ रखने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। विज्ञान कोई मंत्र या श्लोक नहीं देता है। वह तो सिर्फ प्रयोग की भाषा जानता है। विज्ञान के सत्य को किसी की श्रद्धा की भूख नहीं है और न ही वह किन्हीं मान्यताओं पर आधारित है। विज्ञान तो पूर्णतया खोज पर, अन्वेषण पर आधारित है। वह कहता है, करो और देखो।

गणित की भाषा से समझें तो योग का मतलब है, जोड़। टोटल। सब एक साथ। अध्यात्म का संदर्भ लें तो योगियों ने योग की अनेक व्याख्याएं की हैं। गीता में अर्जुनविषाद योग से लेकर मोक्षसंन्यासयोग तक योग ही योग है। सहरपा और तिलोपा का अपना सहज योग है। सबकी परिणति एक है। सबका सार एक है। उनके अनुसार योग का मतलब है पूर्ण, समग्र। योग, सुख और दुख का अतिकमण है। योग के हिसाब से होना और न होना साथ-साथ हैं। समस्या यह है कि लोग आधा ज्ञान ले लेते हैं। आधा ज्ञान तो अज्ञान से भी ज्यादा खतरनाक है। योग कहता है कि इस जगत में प्रत्येक चीज के दो आयाम हैं। जन्म-मृत्यु, सुख-दुख, आस्तिक-नास्तिक सब सापेक्षताएं हैं। एक छोर कितना ही दूर मालूम पड़े, पर दूसरा छोर अनिवार्य है। अस्तित्व के साथ अनस्तित्व भी है। अंधेरा और प्रकाश एक ही चीज का विस्तार हैं। जिसे हम अंधेरा कहते हैं वह कम प्रकाश है और जो प्रकाश है वह कम अंधेरा है। जिसने यह जान लिया वह अपने सिर पर बोझ नहीं रखता और भेद-अभेद से पार हो जाता है। जो बांटकर चलेगा, वह संताप में रहेगा।

आदित्यनाथ जिंदगी को एक तरह से जीते आए हैं, उन्हें एक ही रास्ता पसंद है। जब भी कोई उनके बताए रास्ते पर चलने से मना करता है तो आदित्यनाथ को अपनी ‘संस्कृति’ प्रकट करने का अवसर मिल जाता है। परिस्थिति का तकाजा है कि आदित्यनाथ और उनके जैसे लोग थोड़े दिनों के लिए, कम से कम योग दिवस तक अपने प्रवचनों से परहेज करें।
यतेंद्र चौधरी, वसंत कुंज, नई दिल्ली

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