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शरण की सियासत

भारतीय जनता पार्टी पहले से बांग्लादेश से आए हिंदुओं के भारत में शरण के पक्ष में रही है। लेकिन अब इस समुदाय के वोट से भाजपा को कई सीटें हथियाते देख कांग्रेस भी इन्हें शरण दिए जाने का पक्ष लेने लगी है। देश में ऐसे ही जनसंख्या विस्फोट हो चुका है। लोगों को काम पाने […]

Author June 8, 2015 3:46 PM

भारतीय जनता पार्टी पहले से बांग्लादेश से आए हिंदुओं के भारत में शरण के पक्ष में रही है। लेकिन अब इस समुदाय के वोट से भाजपा को कई सीटें हथियाते देख कांग्रेस भी इन्हें शरण दिए जाने का पक्ष लेने लगी है। देश में ऐसे ही जनसंख्या विस्फोट हो चुका है। लोगों को काम पाने और दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए मारा-मारी करनी पड़ रही है। जमीन का संकट उत्पन्न हो गया है। इन सबकी फ्रिक हमारे राजनेताओं को नहीं है। ये समस्या बढ़ाना चाहते हैं, ताकि अपनी सियासी रोटी मजे से सेंक सकें।

भारतीय जनता पार्टी का तर्क है कि बांग्लादेश में अत्याचार का सामना कर भारत आए हिंदुओं को शरण के साथ नागरिकता प्रदान की जानी चाहिए। इस पूरे मसले को मानवीय दृष्टिकोण से देखने की बात भारतीय जनता पार्टी कहती है। तब फिर संदिग्ध बांग्लादेशियों के खिलाफ न्यायाधिकरण में मामला चलाने और उनकी शिनाख्त के लिए इतना तामझाम कर, खर्च करने की जरूरत नहीं है।

असम में बांग्लादेश से आए अनेक हिंदू और मुसलिम परिवार रहते हैं। न्यायाधिकरण द्वारा विदेशी करार दिए गए फरार लोगों की जो सूची असम पुलिस की सीमा शाखा ने हाल ही में प्रकाशित की है उसमें बंगाली हिंदू और मुसलिम नामों की भरमार है। असम की बराक घाटी और कई विधानसभा सीटों के नतीजों में इनकी अहम भूमिका होती है। पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने बांग्लादेश में सताए गए और असम आए लोगों को भारत में शरण देने का मुद्दा उठाया था। इसके चलते कांग्रेस को बराक घाटी की चौदह में से तेरह सीटें मिली थीं। तरुण गोगोई सताए गए सिर्फ हिंदुओं की बात नहीं कर रहे थे। लेकिन अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अंजन दत्त ने बांग्लादेश में सताए जाने के चलते आए हिंदुओं को शरण दिए जाने की बात कह दी है। यानी कांग्रेस और भाजपा एक ही नाव पर सवार हो गई हैं।

असम में विदेशियों को खदेड़ने के लिए छह साल तक आंदोलन हुआ था। सरकार के साथ असम समझौता हुआ। इसमें स्पष्ट लिखा है कि पचीस मार्च, 1971 के बाद जो भी आया है, उसे जाना होगा। सभी को यह मान्य है। अब इसके आधार पर ही राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) को अद्यतन बनाने का कार्य किया जाएगा। अगर अभी तक के सताए बांग्लादेशियों को लेना है तो फिर असम समझौते को कुचला जाएगा? फिर एनआरसी का तामझाम करने की जरूरत ही क्या है।

सवाल है कि अगर बांग्लादेश से आए हिंदुओं को लेने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना है तो म्यांमा से आए रोहिंग्या और बांग्लादेश के चकमा लोगों के प्रति भेदभाव क्यों? क्या हिंदू बंगाली आपके वोट बैंक हैं इसलिए?

बांग्लादेश पड़ोसी देश है। भारत के साथ उसके अच्छे संबंध हैं। अभी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां गए हैं। तब बांग्लादेश में हिंदुओं को सताने का मसला क्यों नहीं उठाया जाता। किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर बांग्लादेश में हिंदुओं को सताने का मसला फिलहाल उठते नहीं दिखा है। लेकिन उन्हें भारत में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह सरासर गलत है।
राजीव कुमार, घोरामारा, गुवाहाटी

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