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पितृसत्ता की परतें

पिछले कुछ दिनों से हरियाणा की दो बहनें, बस में कथित छेड़छाड़ के विरोध में तीन लड़कों से भिड़ने और उनकी बेल्ट से पिटाई करने के कारण मीडिया और सोशल मीडिया में छाई रहीं। उसी बस में यात्रा कर रही एक महिला द्वारा बनाया गया इस घटना का वीडियो ‘वायरल’ हो गया। इसके साथ ही […]

Author December 22, 2014 12:04 pm

पिछले कुछ दिनों से हरियाणा की दो बहनें, बस में कथित छेड़छाड़ के विरोध में तीन लड़कों से भिड़ने और उनकी बेल्ट से पिटाई करने के कारण मीडिया और सोशल मीडिया में छाई रहीं। उसी बस में यात्रा कर रही एक महिला द्वारा बनाया गया इस घटना का वीडियो ‘वायरल’ हो गया। इसके साथ ही एक और वीडियो सामने लाया गया जिसमें ये बहनें पार्क में किसी लड़के को पीट रही हैं। इसी के साथ रोहतक की दो बहनों का कृत्य विवादग्रस्त हो गया कि यह यौन-हिंसा का बहादुरी से दिया गया जवाब था या इन लड़कियों की दबंगई?

सरकार ने घटना की जांच के आदेश देते हुए इन बहनों के सम्मान की घोषणा को स्थगित कर दिया और ड्राइवर और कंडक्टर का निलंबन भी वापस ले लिया। सरकार ने जो किया वह विवेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता। उसे इतनी जल्दी क्या पड़ी थी? लड़कियों को मुसीबत से बचाने की त्वरित कार्रवाई अपेक्षित है, लेकिन बहनों के सम्मान की घोषणा और बस ड्राइवर और कंडक्टर का निलंबन समुचित जांच-पड़ताल के बाद हो सकता था। इन दिनों सरकारें अपने कलंक मिटाने या मीडिया में यश पाने के इरादों से ऐसी घोषणाएं करती हैं। निर्भया को घर जाने के लिए सोलह दिसंबर की शाम आॅटो मिल गया होता तो वह बच जाती। हाल ही में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ की एक बच्ची शादी में हल्द्वानी आती है, जो समारोह से अचानक गुम हो जाती है और चार दिन बाद उसकी लाश उसके साथ दरिंदगी की कहानी कहती पास ही झाड़ियों से बरामद होती है। मुख्यमंत्री तत्काल दस लाख रुपए मुआवजे का एलान कर देते हैं, मानो वह उसकी कीमत हो!

पिछले महीने मैंने प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो. कृष्ण कुमार की चर्चित किताब ‘चूड़ी बाजार में लड़की’ पढ़ी। यह बताती है कि लड़के और लड़कियों में जन्म के समय प्राकृतिक रूप से होने वाला शारीरिक अंतर सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों से किस तरह न सिर्फ गहराता चला जाता है, बल्कि महिलाओं के व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध करके उन्हें जीवनपर्यंत विषमता और शोषण का शिकार बनाया जाता है। समाज और संस्कृति के ‘औजारों’ से लड़की को तराशने का काम शैशवावस्था से ही आरंभ हो जाता है ताकि बड़ी होने पर वह समाज की नजर में केवल और केवल एक ‘अच्छी’ नारी दिखे।

पिछले सालों में मुझे उत्तराखंड के गांवों और कस्बों की किशोरियों और महिलाओं की अनेक गोष्ठियों-सम्मेलनों में शामिल होने का अवसर मिला है। अच्छी और बुरी या खराब लड़की क्या है, इन सवालों के जो जवाब अक्सर सामाजिक सोच को अभिव्यक्त करते हैं। नजरें झुका कर चलना, कम बोलना, पलट कर जवाब नहीं देना, शर्माना, अपराध को चुपचाप सहन करना जैसी बातें यहां भी एक अच्छी महिला के लक्षण माने जाते हैं। जिस लड़की में इसके विपरीत गुण दिखें वह समाज की दृष्टि में बुरी या खराब है। लड़कों से सामान्य मेलजोल या बोलचाल तक को अक्सर ‘चरित्रहीनता’ का लक्षण माना जाता है या जींस पहनने को लड़की के ‘बिगड़ना’ समझ लिया जाता है। लिंगानुपात की दृष्टि से भारत के सबसे खराब राज्यों में शामिल हरियाणा के कस्बों और देहातों में रह रहे लोगों की सोच इससे कितनी फर्क होगी? आश्चर्य की बात नहीं। बीबीसी की पत्रकार रूपा झा की यह टिप्पणी- ‘जिस रूढ़िवादी समाज से वो हैं उसमें कई विसंगतियां हैं और उनसे मजबूती से लड़ना और उन पर बात करना ऐसी चीज नहीं है जिसे गांव वाले आसानी से समझ सकें ’, गौर करने लायक है। पितृसत्ता इतनी जल्दी हार कैसे मान ले? जिस समाज में लोग महिलाओं के विरुद्ध बड़े अपराध होने पर भी मुंह नहीं खोलते वहां चार महिलाओं का अपने आप उन लड़कों के पक्ष में शपथपत्र के साथ बयान क्या आश्चर्य और संशय पैदा नहीं करता?

’कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा

 

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