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कैसा गठबंधन

‘मित्रता में अद्वैतभाव होता है। … मित्रता समान गुण वालों के बीच शोभती और निभती है। मित्र एक-दूसरे को प्रभावित किए बिना रह ही नहीं सकते…।’ प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद से ही मोदीजी देशवासियों को और विदेश यात्राओं के दौरान भी गांधीजी के विचारों और आदर्शों की चर्चा करते रहे हैं, इसलिए जम्मू-कश्मीर […]

Author March 9, 2015 10:05 PM

‘मित्रता में अद्वैतभाव होता है। … मित्रता समान गुण वालों के बीच शोभती और निभती है। मित्र एक-दूसरे को प्रभावित किए बिना रह ही नहीं सकते…।’ प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद से ही मोदीजी देशवासियों को और विदेश यात्राओं के दौरान भी गांधीजी के विचारों और आदर्शों की चर्चा करते रहे हैं, इसलिए जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन के संदर्भ में महात्मा गांधी की आत्मकथा में लिखी इन पंक्तियों का स्मरण हुआ। भारत की राजनीति में पिछले दशकों के दौरान हुए गठबंधनों में समान गुणधर्म की बात भुलाई गई है तो इसके पीछे मुख्य कारण सत्ता की भूख और इसे पाने के प्रति उतावलापन रहा है। इसलिए उस अद्वैतभाव के दर्शन का सुख हमें कभी नहीं मिल सका, जिसका उल्लेख गांधीजी करते हैं।

भारतीय राजनीति में ‘तेल और पानी’, ‘हिरण और बाघ’ दक्षिणपंथी और वामपंथी- ये सब परस्पर गठबंधन या सहयोग कर सकते हैं। वैसे रसोई में पकने वाले अनेक व्यंजनों में भी परस्पर भिन्न गुण या स्वाद की चीजें मिलाते हैं, लेकिन क्या-क्या मिलाना है और किस अनुपात में यह भलीभांति ज्ञात होता है। इसीलिए स्वादिष्ट या कम से कम खाने योग्य व्यंजन बन जाता है। लेकिन भारतीय राजनीति की खिचड़ी में कुछ भी और कितना भी मिलाने की प्रवृत्ति से जो व्यंजन कहा जाने वाला पक रहा है उससे बदहजमी ही हो रही है। इसका ताजा उदाहरण हमें जम्मू-कश्मीर में दिखा है। भाजपा ने वहां सरकार बनाने के लिए पीडीपी के साथ गठबंधन कर लिया, जिससे भाजपा की राज्य में पहली बार सरकार बनी और उसके दल का व्यक्ति उप-मुख्यमंत्री बना।

लेकिन सब जानते हैं कि धारा-370 सहित अनेक प्रमुख मुद्दों पर दोनों दलों के बीच सैद्धांतिक मतभेद रहे हैं। शपथ ग्रहण समारोह, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के बड़े नेतागण मौजूद रहे- के तुरंत बाद दिए बयान में पीडीपी के नवनियुक्त मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने राज्य के विधानसभा चुनावों में लोगों द्वारा भारी मतदान का श्रेय हुर्रियत नेताओं के साथ सभी आतंकवादी गुटों को देकर भाजपा के लिए मुश्किल पैदा कर दी। इतना ही नहीं, पीडीपी के आठ विधायकों ने अफजल गुरु की अस्थियां सौंपने की मांग कर डाली हैं। राजनाथ सिंह को संसद में मुफ्ती के उस विवादास्पद बयान से अपनी सरकार और पार्टी के पूर्णतया अलग होने की बात कहनी पड़ी है, लेकिन राज्य में दोनों दल किस तरह बार-बार एक को दूसरे से अलग करते रहेंगे?

अजीब बात है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद कश्मीर के मतदाताओं, भारत के सुरक्षा बलों और चुनाव आयोग को श्रेय नहीं दे रहे! यह तो वैसा ही हुआ कि कोई बीमार व्यक्ति उपचार के बाद रोगमुक्त होते ही इसका श्रेय डॉक्टर या दवाइयों को देने के बदले विषाणुओं को देते हुए कहे कि वह इसीलिए चंगा हो सका, क्योंकि विषाणुओं ने उसके शरीर पर हमला नहीं किया। भाजपा और पीडीपी का यह गठबंधन, जिसकी शुरुआत ही इस तरह हो रही है, आगे कैसा रूप और आकार लेगा?
कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा

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