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तथ्य और कथ्य

इकतीस दिसंबर, 2014 को पोरबंदर से दो सौ पैंसठ किलोमीटर दूर समुद्र में संदिग्ध पाकिस्तानी नौका को उड़ाने के मामले में भारतीय तटरक्षक बल के डीआइजी बीके लोशाली के ताजा बयान से मामला उलझने के साथ ही भारत सरकार की साख पर सवालिया निशान लगाता है। वैसे यह मामला पहले से ही विवाद में रहा […]

Author February 23, 2015 11:35 AM

इकतीस दिसंबर, 2014 को पोरबंदर से दो सौ पैंसठ किलोमीटर दूर समुद्र में संदिग्ध पाकिस्तानी नौका को उड़ाने के मामले में भारतीय तटरक्षक बल के डीआइजी बीके लोशाली के ताजा बयान से मामला उलझने के साथ ही भारत सरकार की साख पर सवालिया निशान लगाता है। वैसे यह मामला पहले से ही विवाद में रहा और रक्षामंत्री के उस समय के बयान पर कि तटरक्षकों द्वारा ललकारे जाने पर नौका में सवार लोगों ने विस्फोट करके नौका सहित खुद को उड़ा लिया, तब भी पाकिस्तान के अलावा भारत के विपक्ष और मीडिया द्वारा स्पष्टीकरण और सबूतों की मांग की जा रही थी। अब उस अभियान से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का यह कहना कि उनके आदेश पर उस नौका को उड़ा दिया गया था, भारत सरकार के दावे पर संदेह को ही बढ़ाता है। एक तो उप महानिरीक्षक स्तर का पद कोई छोटा नहीं होता और दूसरी बात कि वह अधिकारी उसी क्षेत्र में तैनात था। सवाल यह उठता है कि झूठ किसने बोला? रक्षामंत्री ने या उस अधिकारी ने?

जब देश के अंदर ही सवाल उठ रहे हों तब पाकिस्तान अगर उठाए तो अनुचित कैसे कह सकते हैं। बयानों में यह विरोधाभास विभागीय अनुशासन का मामला तो है, लेकिन केवल इतना ही नहीं है, क्योंकि मामला भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और साख से सीधे तौर पर जुड़ा है। एक मामले में विरोधाभासों के कारण सवालों के घेरे में आने से अन्य मामलों में भी देश का पक्ष कमजोर होगा।

चिंताजनक यह है कि किसी व्यक्ति की साख बनने में बड़ा वक्त लगता है, देश की साख तो और भी लंबे समय में ही बन पाती है। लेकिन इस तरह के केवल एक-दो मामले ही इस साख को गिरा सकते हैं। यह कूटनीतिक पहलू से भी बुरी बात है। इसके अलावा भारत के अंदर भी पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों और सेना पर भी झूठी मुठभेड़ों में गुनहगारों या बेगुनाह नागरिकों को मार डालने के आरोप लगते रहे हैं। पिछले साल ऐसा ही मामला उजागर हुआ था जिसमें सेना के अधिकारियों ने पुरस्कार-पदोन्नति पाने की आशा से फर्जी मुठभेड़ की साजिश रची, बेकसूर नागरिकों को अगवा करके उनको मार दिया और उन्हें आतंकवादी करार दिया।

देश की बाहरी और भीतरी दुश्मनों से रक्षा सर्वोपरि है और इस काम में जुटे बलों की चुस्त कार्रवाई बिल्कुल जायज है। लेकिन यह सब स्थापित नियम-कानूनों के अनुसार ही मान्य हो सकता है। अगर इनका गंभीर उल्लंघन होता है या निर्दोष लोगों का जीवन अकारण या बिना उचित कारण के खत्म कर दिया जाता है तो सरकार की छवि को नुकसान पहुंचता है। अच्छा होगा कि भारत सरकार जो भी सच्चाई है उसे मय सबूत देश के सामने रख कर विवाद का पटाक्षेप करे।
कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा

 

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