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चौपाल: अन्न की बर्बादी

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल चालीस फीसद खाना बर्बाद हो जाता है जिनकी कीमत अन्न के रूप में लगभग पचास हजार करोड़ रुपए सालाना बैठती है। इन आंकड़ों से साफ है कि अन्न के महत्व के प्रति लोगों में जागरूकता और नैतिकता पूरी तरह से अभाव है।

Author December 5, 2018 5:36 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Express Archive Photo)

भारत की धरती को अन्नदाता देश के रूप में जाना जाता है। भारत के पचास फीसद से भी ज्यादा लोग कृषि और कृषि व्यवसाय के कामों में लगे हुए हैं। लेकिन इसके बावजूद भारत में कुपोषण की समस्या गंभीर रूप धारण करती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषित लोगों की संख्या 19.07 करोड़ है, जो दुनिया में सर्वाधिक है, देश में पंद्रह से उनचास वर्ष की 51.4 फीसद महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हैं और पांच वर्ष से कम उम्र के 38.4 फीसद बच्चे अपनी आयु के मुताबिक कम लंबाई के हैं। देश भर के इक्कीस फीसद बच्चों का वजन औसतन वजन से भी कम है। भोजन की कमी से हुई बीमारियों के कारणवश पिछले डेढ़ सालों में देशभर में लगभग उनसठ हजार बच्चों की मौते हुर्इं। भुखमरी और कुपोषण की वजह से भारत में पिछले एक साल में तीन लाख लोग अपनी जिंदगी खो बैठे हैं।

रजिस्ट्रार जर्नल आॅफ इंडिया के सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश भारत का सबसे कुपोषित राज्य है, जहां प्रति हजार बच्चों में से बावन बच्चे कुपोषण की समस्या के कारण अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाते हैं। सरकार के भुखमरी कम करने के दावों के बावजूद 2016 की तुलना में वर्ष 2017 में वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत तीन पायदान नीचे उतर गया है। पिछले साल भारत इस सूचकांक में 97वें स्थान पर था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में भूख से मरने वालों की संख्या घटने की बजाय और तेजी से बढ़ रही है। दूसरी ओर देश में शादियों, उत्सवों में अन्न की बबार्दी देखने को मिलती है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल चालीस फीसद खाना बर्बाद हो जाता है जिनकी कीमत अन्न के रूप में लगभग पचास हजार करोड़ रुपए सालाना बैठती है। इन आंकड़ों से साफ है कि अन्न के महत्व के प्रति लोगों में जागरूकता और नैतिकता पूरी तरह से अभाव है।
अखिल सिंघल, नई दिल्ली

आवारा पशुओं का आतंक: राजस्थान भारत के सर्वश्रेष्ठ पर्यटन स्थलों में से एक है। यही पर्यटन स्थल आज आवारा पशुओं की सैरगाह बना हुआ है। जयपुर में आवारा पशुओं की समस्या नासूर बन गई है। यहां गाय, सांड, सूअर, बंदर और कुत्ते लोगों की सबसे बड़ी परेशानी बन गए हैं। आवारा पशुओं ने राजधानी जयपुर में पिछले एक साल में एक विदेशी पर्यटक सहित तीन लोगों की जान ले ली। प्रदेश भर में एक दर्जन लोग मौत के मुंह में समा चुके हैं। जानवरों के हमलों में घायलों की संख्या तो सैंकड़ों में है। पिछले हफ्ते ही एक सांड ने महिला को सींग मार कर मौत के घाट उतार दिया। पिछले साल एक विदेशी पर्यटक को ऐसे ही हमले में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। हाई कोर्ट ने प्रशासन को फटकारा तब आवारा पशुओं की धर पकड़ हुई। कुछ दिनों बाद प्रशासन ने अपने हाथ खींच लिए और इसी के साथ आवारा पशुओं के धर पकड़ का अभियान बंद हो गया।

आवारा पशुओं का यह मुद्दा हमें देखने में छोटा लगता है, लेकिन है बड़ा गंभीर। गाय भैंस या सांड़ ही क्यों, आवारा कुत्ते भी लोगों की नाक में कम दम नहीं करते। लोग डर के कारण घर से बाहर तक नहीं निकल पाते। अब तो शहरों में बंदरों का खौफ भी देखा जा रहा है। अस्पतालों में बंदरों के काटने के बहुत से मामले सामने आने लगे हैं। अक्सर खाद्य व सब्जी आदि की दुकानों पर भी यह अपना मुंह मारते रहते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में समुचित सफाई नहीं होने और जगह-जगह कचरे के ढेर लग रहने से वहां आवारा मवेशियों का जमघट लगा रहता है। जिससे लोगों का निकलना मुश्किल हो जाता है।
बाल मुकुंद ओझा, जयपुर

प्रसव की पीड़ा: आइआइएम-अमदाबाद के एक अध्ययन से जो यह खुलासा हुआ है कि देशभर के सत्तर हजार अस्पतालों में एक साल में नौ लाख प्रसव सिजेरियन हुए, चौंकाने वाला है। यह तो सिर्फ एक साल का आंकड़ा है। बरसों से बेवजह शल्यक्रिया से प्रसव का खेल चल रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय आखिर क्या देख रहा है? क्या उसे इस बारे में कुछ मालूम नहीं चला? या फिर जानबूझकर अनदेखी ही की जाती रही? सामान्य प्रसूति के मुकाबले शल्यक्रिया के जरिए प्रसव कराने में अस्पतालों को भारी मुनाफा होता है। निजी अस्पतालों में इलाज इतना महंगा हो गया है कि आम आदमी के बूते की बात ही नहीं रही। दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं अपूर्ण होने से निजी अस्पतालों की चांदी हो रही है और मरीज लुट रहे हैं। ये तो सिर्फ प्रसूति की बात है, अन्य बीमारियों में मरीजों और उनके परिजनों को कितना परेशान होना पड़ता होगा, यह तो भुक्त भोगी ही बता सकते हैं। सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए और मरीजों के हित में विशेष कदम उठा कर निजी अस्पतालों पर शिकंजा कसना चाहिए, ताकि मरीज निजी अस्पतालों में लुटने बच सकें।
शकुंतला महेश नेनावा, इंदौर

पुलिस की हालत: बीते दिनों जिस प्रकार पूरे देश में पुलिस कर्मियों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं देखने को मिली हैं, उससे गंभीर सवाल खड़े होते हैं। आखिर वो तबका जिन्हें हम समाज के रक्षक के तौर पर देखते हैं, वे किन परिस्थितियों में इतने कमजोर हो जाते हैं कि उन्हें आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर होना पड़ता है? पुलिस विभाग जैसे बड़े संगठन के अंग होने के बावजूद वे इतने अकेले कैसे पड़ जाते हैं? इस परिस्थितियों में समाज के सुरक्षा का क्या होगा? पुलिस व्यवस्था के अंदर संगठनात्मक-कार्यात्मक सुधार की मांग लंबे समय से उठती रही है। पुलिस को हर लिहाज से अच्छा बनाने की दिशा में कदम उठाने के लिए समय-समय पर कई आयोग बनाए गए, जिन्होंने पुलिस सुधार से संबंधित रिपोर्टें भी दीं। पर दुख की बात है कि किसी भी रिपोर्ट की सिफारिशों को सरकारों ने गंभीरता से नहीं लिया और ये रिपोर्टें कूड़ेदान में चली गईं। इसका नतीजा यह हुआ है कि पुलिस की दशा सुधारने की दिशा में अभी तक किसी प्रकार की कोई ठोस पहल नहीं हुई है। जब पुलिस मानसिक रूप से खुद ही इतनी बीमार होगी तो जनता की सुरक्षा कैसे करेगी?
रवि रंजन, बीएचयू

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