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चौपाल: कैसा भय

इस समय केंद्र सरकार 299 व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान कर रही है। इसके अलावा राज्य सरकारों ने अपने तमाम नेताओं को अलग से सुरक्षा दे रखी है। इन 299 व्यक्तियों में से 26 को जेड प्लस सुरक्षा, 59 को जेड श्रेणी, 145 को वाई प्लस, जबकि एक व्यक्ति को वाई श्रेणी और 68 को एक्स श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है।

Author Updated: February 15, 2019 5:41 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

देश की आम जनता को समुचित सुरक्षा मिले या न मिले, पर्याप्त सुरक्षाकर्मियों के अभाव में जघन्य अपराध बढ़ने के बावजूद पंचायत के मुखिया और छुटभैये नेताओं से लेकर बड़े-बड़े राजनेता सरकारी खर्च पर सुरक्षा प्राप्त करना अपनी शान समझते हैं। इसकी वजह स्वयं को जनता के बीच विशिष्ट और अतिविशिष्ट होने का अहसास कराना भी है। लेकिन हास्यप्रद स्थिति उस समय हो जाती है जब अपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति राजनीति में पैठ बनाने के बाद विरोधियों से अपनी जान बचाने के लिए सरकारी खर्च पर सुरक्षा हासिल कर लेते हैं। कई बार अदालतों के सख्त रुख के बाद इनसे सुरक्षा वापस तक लेनी पड़ी है।
इस समय केंद्र सरकार 299 व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान कर रही है। इसके अलावा राज्य सरकारों ने अपने तमाम नेताओं को अलग से सुरक्षा दे रखी है। इन 299 व्यक्तियों में से 26 को जेड प्लस सुरक्षा, 59 को जेड श्रेणी, 145 को वाई प्लस, जबकि एक व्यक्ति को वाई श्रेणी और 68 को एक्स श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। इसके अलावा सुरक्षा के लिहाज से बुलेट प्रूफ गाड़ियों, दूसरे वाहनों, सुरक्षा उपकरणों की खरीद और उनके रखरखाव का खर्च सरकार अलग से वहन करती है।

ब्रिटेन में 84 वीआइपी हैं, फ्रांस में 109, जापान में 125, चीन में 435, जबकि हमारे देश में वीआइपियों की संख्या 5,79,092 है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि पंचायत के सरपंच और मुखिया से लेकर रसूखवाले नेताओं को मिली इस सुरक्षा का खर्च उन्हीं से वसूला जाए? क्योंकि आम नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने की बजाय इन कुछ सौ व्यक्तियों की सुरक्षा में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मी तैनात करना सरासर देश के संसाधनों के साथ ही जनता के धन का दुरुपयोग भी है। हमारे यहां जेड प्लस, जेड, वाई प्लस और वाई श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त नेता जब किसी समारोह या जनसभा में अपनी गाड़ियों के काफिले और सुरक्षा तामझाम के साथ पहुंचते हैं, तो लगता है मानो ब्रिटिश राज का कोई लाट साहब पहुंच रहा हो! नेताओं को मिली इस सुरक्षा से आम जनता के मन में भय पैदा होता है। जिस जनता ने उन्हें अपना नेता चुना है, उसके बीच जाने में उन्हें भय कैसा? वैसे भी लोकतंत्र में जनता और राजनेता के बीच दूरी ठीक नहीं मानी जाती।

पड़ोसी पाकिस्तान में तो उच्चतम न्यायालय ने दो टूक शब्दों में राजनेताओं को अपनी सुरक्षा का बंदोबस्त खुद के पैसे पर करने का आदेश दे दिया है।
प्रधानमंत्री हमेशा वीआइपी संस्कृति खत्म करने की पैरवी करते दिखाई पड़ते हैं। इसलिए वे मैट्रो तक में बैठकर सफर करने से गुरेज नहीं करते। जब उन्होंने गाड़ियों से लाल बत्ती हटाने का आदेश दिया था, तो सभी ने इस फैसले की सराहना की थी। लगा था कि अब जनता और राजनेता के बीच कोई फर्क नहीं रहेगा। इसी तरह यदि प्रधानमंत्री बिना जरूरत के सुरक्षा का तामझाम लेकर घूम रहे नेताओं को अपनी सुरक्षा का खर्च खुद वहन करने को कहेंगे, तो ज्यादातर नेता अपनी सुरक्षा वापस कर देंगे और यदि कोई सुरक्षा चाहेगा भी तो उससे सरकार को राजस्व प्राप्त होगा। वैसे भी राजनेता अपनी सुरक्षा का खर्च खुद वहन कर सकते हैं। इससे प्राप्त राजस्व से देश के विकास को नई रफ्तार मिल सकेगी।
रोहित यादव, महर्षि दयानंद विवि, रोहतक

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