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चौपाल: वोट की कीमत

सही मायनों में वोट देने के बाद ही हमें किसी सरकार की आलोचना और शिकायत करने का हक होता है। हमारे वोट से ही सरकार की जिम्मेदारी और जबाबदेही तय होती है। हमारे यहां बहुत से लोग किसी भी प्रतिनिधि को सिर्फ इसलिए वोट दे देते हैं कि वह उनकी पसंदीदा पार्टी से खड़ा है या उनके पसंद के नेता से संबंधित है।

Author December 13, 2018 5:30 AM
वोटिंग की प्रतीकात्मक फोटो, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

लोकतंत्र में जितना महत्त्वपूर्ण वोट देना है उतना ही महत्त्वपूर्ण एक अच्छे प्रतिनिधि को चुन कर संसद में भेजना भी है। लेकिन हाल ही संपन्न पांच राज्यों के चुनाव में मतदान प्रतिशत 70 तक ही पहुंच सका। इनमेंं करीब पंद्रह लाख लोगों ने ‘नोटा’ का बटन दबाया। यकीनन वोट न डालने वाले लोगों का मानना होगा कि भला उनके एक वोट से क्या बदल जाएगा! सीपी जोशी एक बार चुनाव में महज एक वोट से हार गए थे। सही मायनों में वोट देने के बाद ही हमें किसी सरकार की आलोचना और शिकायत करने का हक होता है। हमारे वोट से ही सरकार की जिम्मेदारी और जबाबदेही तय होती है। हमारे यहां बहुत से लोग किसी भी प्रतिनिधि को सिर्फ इसलिए वोट दे देते हैं कि वह उनकी पसंदीदा पार्टी से खड़ा है या उनके पसंद के नेता से संबंधित है। बहुत से लोग तो सिर्फ इसलिए किसी पार्टी को वोट दे देते हैं कि उनके बड़े बुजुर्ग उसी दल को वोट देते आए हैं।

हमारी इसी गलती के चलते आज लोकसभा और राज्यसभा में तीस फीसद सदस्य कथित आपराधिक छवि और विवादित बयान देने वाले बैठे हैं। जो खुद अपराध का आरोपी है, उससे भला बदलाव की क्या उम्मीद की जा सकती है! जरूरत इस बात की है कि हम मतदान से पहले अपने प्रतिनिधि को जान लें कि वह कितना शिक्षित है, कितना ईमानदार और कहीं अपराधिक छवि वाला तो नहीं है! बेशक हम किसी पार्टी और उसके अध्यक्ष या किसी प्रधानमंत्री को पसंद करते हों पर हमारी दैनिक जरूरतों में शामिल बिजली-पानी और टूटी सड़कों और तमाम समस्याओं को हमारे चुने गए प्रतिनिधि ही सुनेंगे और उनका समाधान करेंगे। कोई प्रधानमंत्री या पार्टी अध्यक्ष हमारी समस्याओं को सुनने नहीं आएगा। हमारे इलाके के लिए हमारा प्रतिनिधि ही सबकुछ होता है। देश का विकास हर गली-मोहल्ले और छोटे-छोटे नगरों से मिल कर ही होता है। अगर हर नगर में एक काबिल प्रतिनिधि जीत कर आएगा तो देश का विकास स्वत: ही हो जाएगा। इसलिए अगली बार हमें पार्टी या अध्यक्ष से पहले उस प्रतिनिधि को देखना होगा जिसे हम वोट देने जा रहे हैं; जिसके हाथों में अपने इलाके की कमान सौंपने जा रहे हैं।
रोहित यादव, महर्षि दयानंद विवि, रोहतक

हार या जीत: पांच राज्यों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण बिना तथ्यों के किया जा रहा है। आखिर कितनी बड़ी है भाजपा की हार और कांग्रेस की जीत? मध्यप्रदेश में भाजपा ने कांग्रेस से अधिक मत प्राप्त किए हैं भले ही सीटें पांंच कम पाई हों। राजस्थान में दोनों पार्टियों को मिले वोटों में केवल आधा प्रतिशत का अंतर है जबकि सीटों में बाईस का। फिर दोनों राज्यों के मतदाताओं ने कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत से वंचित रखा है।
उधर तेलंगाना के चुनाव प्रचार में सोनिया गांधी को भी शामिल कर लेने के बावजूद राहुल गांधी की पार्टी की 2014 के मुकाबले दुर्गति बनी। वहां कांग्रेस अध्यक्ष ईवीएम को दोषी बता रहे हैं। मिजोरम में तो कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ हो गया। पूर्वोत्तर के सातों राज्यों से वह निष्कासित हो गई है। यहां भी राहुल ने ईवीएम को खलनायक ठहराया है। मतलब, जहां स्थिति सुधरी, वहां श्रेय स्वयं को और जहां बिगड़ी, वहां दोष वोटिंग मशीन को!
अजय मित्तल, मेरठ

ऐसी शिक्षा: विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो ने कहा था कि अगर आप किसी बच्चे का बचपन नहीं लौटा सकते तो आपको उसका बचपन छीनने का भी अधिकार नहीं है। लेकिन हम लोग अपने बच्चों का बचपन छीनने का नासमझीभरा कृत्य रोजाना करते हैं। मसलन, अपने नन्हे बच्चों की पीठ पर लगभग उनके वजन के बराबर किताबों और कॉपियों का बोझ लाद कर घर से स्कूल भेजते हैं। उससे भी ज्यादा होम वर्क का बोझ लादकर ये अंग्रेजी भाषा से प्यार और अपनी मातृभाषा से घृणा करने वाले कथित मॉडर्न पब्लिक स्कूल मासूमों को घर लौटाते हैं।
हमें प्रेरणा लेनी चाहिए नीदरलैंड की शिक्षा व्यवस्था से जहां की सरकार और लोग अपने बच्चों को छह वर्ष की उम्र के बाद स्कूल भेजते हैं। वहां हाईस्कूल तक कोई परीक्षा नहीं होती, सारी माातृभाषा में ही पढ़ाई होती है। हमारे शिक्षालय दरअसल शिक्षालय न होकर मानसिक, शारीरिक और आर्थिक ‘शोषणालय’ होकर रह गए हैं! ये सभी तरह के शोषण जितना जल्दी हो सके, बंद होने ही चाहिए ताकि हमारे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास सामान्य ढंग से हो सके।
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

हमारा नंबर: हमें यह अवश्य मालूम होना चाहिए कि दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषित देशों में हमारा नंबर ऊपर से आठवां है। पहला स्थान पाकिस्तान ने हासिल किया है और उसके बाद क्रमानुसार कतर, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मिस्र, संयुक्तअरब अमीरात, मंगोलिया, भारत, बहरीन, नेपाल, घाना, जॉर्डन, चीन, सेनेगल, टर्की, बुल्गारिया, मॉरिशस, पेरू, सर्बिया और ईरान इस पायदान पर हैं। हम इस उपलब्धि पर इसलिए गर्व कर सकते हैं कि इसने हमारे यहां रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं! इसकी वजह से केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का जन्म हुआ और अनेक लोगों को उसमें रोजगार मिला! प्रदूषण ने अनेक लेखकों को पत्र-पत्रिकाओं में लिखने के लिए अवसर दिया है!

प्रदूषण जनित रोगों से जहां एक ओर डॉक्टरों की आमदनी में इजाफा हुआ है, वहीं दूसरी ओर एयर प्यूरीफायर, पोर्टेबल आॅक्सीजन सिलिंडर और मॉस्क बनाने वाले लघु उद्योग भी खुले हैं। लोग घरों में रहने को विवश हैं, इसलिए ट्रैफिक जाम भी कुछ कम हो रहा है। मास्क मुंह पर लगा हो तो ‘तू-तू मैं-मैं’ की संभावना में जो भारी कमी आती है, उससे कानून व्यवस्था बनाए रखने में भी मदद मिलती है! अब हमारा प्रदूषण को लेकर एक ही लक्ष्य होना चाहिए कि हम पाकिस्तान के बजाय खुद शीर्ष स्थान पर हों। दुश्मन की ऊंचाई कभी भी और कहीं भी अच्छी नहीं लगती!
सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

वायदों की अनदेखी: चुनावी नतीजे हमेशा कुछ-न-कुछ संदेश छोड़ जाते हैं। राम मंदिर, विदेश से काला धन लाने, घोटालेबाजों को दंडित करने, कश्मीरी पंडितों को घाटी में पुनर्स्थापित करने आदि-आदि जो वायदे पिछले चुनावों में उछाले गए थे, उन्हें पूरा नहीं किया गया। शायद मतदाता ने उन्हीं का जवाब मांगा। सत्ता में बैठे भद्रजन ये सब भूल सकते थे, मगर वोटर नहीं भूला।
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा। जनता वादा-खिलाफी नहीं, वादा-पूर्ति चाहती है।
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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