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चौपाल: सब्र का इम्तहान

राहुल गांधी से कौन कहे कि रफाल का किस्सा किसी सिरे तक तो पहुंच जाने दें। महीनों पहले ही क्यों चोर-चोर चिल्लाना शुरू कर दिया आपने! प्रधानमंत्रीजी तो खैर सर्वेसर्वा हैं और किसी भी हद तक जा सकते हैं, हदों को लांघ भी सकते हैं!

Author February 13, 2019 5:13 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

हर सुबह जैसे ही अखबार हाथ में आता है तो सबसे पहले मुखपृष्ठ की मुख्य खबर और उसके आसपास की कुछ ताजा खबरों पर ध्यान अटक जाता है। देश की राजनीति अपनी सरगर्मियों के साथ खबरों पर छाई रहती है। समय के साथ राजनीति का चेहरा और अंदाज बदल गए हैं। वैसे चुनावों का मौसम न हो, तो भी ऐसा लगता है कि राजनीति अब देश को चलाने की राजनीति नहीं रही। अब यह सिर्फ चुनावी राजनीति हो गई है। मौसम भी चुनावी हो तब तो बात ही और है। अब तो अखबार की पाठक के रूप में मुझे अपनी बेचारगी पर तरस आने लगा है, क्योंकि अब अक्सर मुखपृष्ठ के नीचे का कार्टून देखना और देख कर मुस्कराना भूलने लगी हूं। ऊपर का फोटू, तेवर, घोषणाएं, आलोचनाएं, यही सब उलझा लेते हैं और तब पृष्ठ छह पर जाने की जल्दी होती है ताकि दिमाग और दिल से जुुुड़ी अच्छी-अच्छी बातें पढ़ने को मिल जाएं, जिससे थोड़ी राहत महसूस हो।

सबसे ज्यादा परेशान करने वाली चीज है चुनाव के मैदान में उतरने वाले हमारे योद्धाओं की भाषा और बेसिर-पैर के तंज। लोकतंत्र, संविधान, कृषि, रोजगार, अर्थव्यवस्था- ऐसे अनेक शब्द हैं जो चुनावी भाषा को गरिमा प्रदान करते हैं। लेकिन यहां तो ‘चौकीदार’, ‘चोर’, फलां के ‘पचपन साल सत्ताभोग के’ और ढिमकाने के ‘पचपन महीने सेवा के’, यानी ये सब लोग और मीडिया वाले जैसे जनता के सब्र का इम्तहान लेने में लगे हैं। राहुल गांधी से कौन कहे कि रफाल का किस्सा किसी सिरे तक तो पहुंच जाने दें। महीनों पहले ही क्यों चोर-चोर चिल्लाना शुरू कर दिया आपने! प्रधानमंत्रीजी तो खैर सर्वेसर्वा हैं और किसी भी हद तक जा सकते हैं, हदों को लांघ भी सकते हैं! अखबार वालों की भी मजबूरी हम समझते हैं। अपनी परेशानी के लिए इन्हें क्यों दोष दें! खुद अपने ही मन को समझा लेते हैं कि चलो, यह भी बीत जाएगा।
शोभना विज, पटियाला

मौत का नशा: उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहरीली शराब पीने से सौ से अधिक लोगों का मौत के मुंह में चले जाना बेहद दुखद है। अवैध शराब की इतनी बड़ी मात्रा में बिक्री क्षेत्रीय प्रशासन पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। क्या वाकई इस मामले की जानकारी किसी को नहीं थी? अगर थी तो सख्ती बरतने में देर क्यों हुई? यह मामला और भी बेहद गंभीर हो सकता था। गांव-देहात में अवैध शराब का बिकना आखिर कब बंद किया जाएगा? इस धंधे में शामिल लोगों पर लगाम कसने के लिए सरकार और प्रशासन को सख्ती बरतनी होगी ताकि आगे ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। इस घटना से सीख लेकर यदि शराब को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाए तो वह अच्छा निर्णय होगा। शराब पीने से न केवल इसकी लत लगती है बल्कि इसके सेवन के बाद लोग आपा भी खो देते हैं। अगर शराब की बिक्री से मिलने वाले राजस्व के मोह में सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी तो भविष्य में इससे भी बड़ा हादसा देखने को मिल सकता है। जनता को भी इस काम में मदद करनी होगी। उसे अपने आसपास हो रहे इस तरह के अवैध धंधों की जानकारी प्रशासन को निडर होकर देनी चाहिए।
आकाश कुमार, मेरठ

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