ताज़ा खबर
 

चौपाल: मुफ्त का आलस

कोर्ट ने कहा कि सभी तबके के लोगों को मुफ्त में चावल देने जैसी योजना से तमिलनाडु के लोग आलसी बन रहे हैं। हर वर्ग को मुफ्त चावल दिए जाने का नतीजा यह निकला कि लोग अब सरकार से हर चीज मुफ्त में चाहते हैं। इससे अब वे आलसी हो रहे हैं और छोटे-छोटे कामों के लिए भी बाहर से मजदूर बुलाने पड़ते हैं।

Author November 28, 2018 5:45 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

मद्रास हाइकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की मुफ्त में चावल दिए जाने की योजना पर उचित ही आपत्ति जताई है। कोर्ट ने कहा कि सभी तबके के लोगों को मुफ्त में चावल देने जैसी योजना से तमिलनाडु के लोग आलसी बन रहे हैं। हर वर्ग को मुफ्त चावल दिए जाने का नतीजा यह निकला कि लोग अब सरकार से हर चीज मुफ्त में चाहते हैं। इससे अब वे आलसी हो रहे हैं और छोटे-छोटे कामों के लिए भी बाहर से मजदूर बुलाने पड़ते हैं। गौरतलब है कि तमिलनाडु में एक वर्ष में मुफ्त चावल बांटने पर 2110 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस या ऐसी ही किसी अन्य शासकीय योजना का लाभ गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों या दिव्यांग व्यक्तियों को ही देना चाहिए। लेकिन सरकार वोट बैंक की खातिर सभी वर्गों को ऐसी योजनाओं का लाभ दे रही है। इससे राज्य का बजट बढ़ जाता है और वह कर्जे में डूब जाता है।

भारत जैसे कल्याणकारी राज्य में मुफ्तखोरी का दुष्चक्र काफी व्यापक हो चुका है। सरकार को चाहिए कि वह लोगों को योग्य और सामर्थ्यवान बनाए ताकि वे स्वयं जीविका चलाने के साथ अपने लिए रोटी, कपड़ा, मकान की व्यवस्था कर सकें। मुफ्त की योजनाएं उन्हें पंगु बना रही हैं। आजादी के सत्तर साल बाद भी हमारे देश के राज्यों में ऐसी अनेकयोजनाएं चल रही हैं। वंचित वर्ग, जिसे इन सरकारी योजनाओं की सचमुच जरूरत है उस तक इनके लाभ पहुंचाने में सरकारें विफल साबित हुई हैं। लोगों को शिक्षित बनाने के लिए योजनाएं चलाई जानी चाहिए ताकि समाज का हर तबका शिक्षित होकर अपने भविष्य के लिए कुछ अच्छा कर सके। किसी भी सरकार के लिए जरूरी है कि वह लोगों को उनकी काबिलियत के अनुसार रोजगार उपलब्ध कराए। इसके लिए हमें स्कूलों को रोजगारोन्मुख शिक्षा से जोड़ना होगा। स्कूली शिक्षा में ही बच्चों को कामकाज के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

चीन, जापान जैसे देशों में स्कूलों में बच्चों को मोमबत्ती, अगरबत्ती बनाने जैसे छोटे-छोटे कुटीर उद्योग के काम कराए जाते हैं ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। भारत में तो लोग जब तक स्नातक न हो जाएं किसी भी तरह का कार्य करना उचित नहीं समझते। हमारी मानसिकता पहले पढ़ाई और सिके बाद जीविका के लिए नौकरी या कोई काम करना है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने श्रम का उपयोग करने लायक कुछ काम मिल सके ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। एक आदमी कमाए और सारा घर खाए, यह उचित नहीं है। लोगों की श्रम शक्ति बेकार चली जाए तो जीडीपी में कमी होना स्वाभाविक है। नागरिकों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार देना और उनके श्रम का सही उपयोग करना सरकार की प्राथमिकता होना चाहिए तभी हम विकसित देशों की कतार में आ सकेंगे।
अमित पांडेय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

तीसरी आंख: दसवीं और बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में सीसीटीवी कैमरे लगवा कर छात्रों को नकल करने से रोकने का सुझाव अच्छा है, मगर ऐसे ही कैमरे हर न्यायालय, पुलिस थाने, सरकारी कार्यालयों, मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों के दफ्तरों में भी होने चाहिए। इससे भ्रष्टाचार को काफी हद तक रोका जा सकता है।
सीसीटीवी कैमरे काफी उपयोगी हो चले हैं। इनकी महत्ता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है क्योंकि शासकीय एवं निजी कार्यालयों, बैंकों, प्रतिष्ठानों और शैक्षणिक संस्थानों में कैमरे लगे रहने से उनकी सच्चाई उसमें कैद होती है जिससे बाद में विवेचना में मदद मिलती है। लेकिन आश्चर्य का विषय है कि आज भी कई शासकीय एवं निजी कार्यालयों में ये कैमरे नहीं लगाए जा सके हैं। इसीलिए उनमें सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
मुकेश शेषमा, झुंझुनू

प्रकृति के साथ: प्रदूषण की समस्या किसी एक व्यक्ति, समाज या देश के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए चिंता का विषय है। इसलिए इन दिनों वैश्विक तापमान वृद्धि, जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत का क्षरण, तेजाबी वर्षा आदि मुद्दे विभिन्न मंचों पर बार-बार सुनाई देते हैं। इन्हीं के कारण जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर कुप्रभाव पड़ रहा है। ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण समूची दुनिया के सामने कई खतरे उत्पन्न हो गए हैं।
आज हम जिस पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहे हैं उसके लिए प्रकृति को लेकर लोगों के नजरिये में आया परिवर्तन काफी हद तक जिम्मेदार है। जहां पहले प्रकृति को पूजा जाता था, उसके अनुसार चला जाता था, आज उसका जम कर शोषण हो रहा है।
पर्यावरणविदों का मानना है कि अगर वर्तमान हालत बदले नहीं गए तो पृथ्वी के औसत तापमान मेें चार डिग्री तक की वृद्धि हो सकती है और इसका परिणाम समुद्र के बढ़ते स्तर, जल चक्र में बदलाव, बाढ़ व सूखे की समस्या, चक्रवात आदि विभिन्न रूपों में देखने को मिलेगा। अगर हम जलवायु परिवर्तन की समस्या या प्रदूषण से निपटना चाहते हैं तो लोगों को भारतीय दर्शन के पर्यावरणीय मूल्यों के प्रति जागरूक करना होगा। साथ ही स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण को पाठयक्रम से जोड़ कर प्रयोगात्मक स्वरूप प्रदान करना होगा।
सौरभ कांत, चौधरी चरण सिंह विश्विद्यालय

मौत का पुल: कहना गलत नहीं होगा कि आज हमारी आदत-सी बन गई है कि अगर कोई गलत काम होता है या दुर्घटना घटती है तो हम बिना सोचे-समझे उसका पूरा दोष सरकार पर मढ़ देते हैं। इसका उदाहरण सिग्नेचर ब्रिज पर हुए हादसों के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाना है।
दिल्ली को हाल ही में मिला सिग्नेचर ब्रिज मौत का पुल बनता जा रहा है। इस पर पिछले दिनों दो बड़ी दुर्घटनाएं हो गर्इं जिनमें तीन नौजवानों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा। ये हादसे बहुत दर्दनाक हैं और चिंताजनक भी क्योंकि इनमें सबसे बड़ी गलती बाइक चला रहे युवाओं की थी। कोई सेल्फी के चक्कर में तो कोई तेज रफ्तार के कारण दुर्घटना का शिकार हुआ। दरअसल, आज नौजवानों के लिए बिना हेलमेट लगाए तेज रफ्तार में आड़े-तिरछे वाहन चलाना, लालबत्ती पार करना जैसे फैशन हो गया है। युवाओं को अपनी और दूसरों की सलामती के लिए यातायात नियमों का हर हाल में पालन करना चाहिए।
आशीष, राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली

किसी भी मुद्दे या लेख पर अपनी राय हमें भेजें। हमारा पता है : ए-8, सेक्टर-7, नोएडा 201301, जिला : गौतमबुद्धनगर, उत्तर प्रदेश
आप चाहें तो अपनी बात ईमेल के जरिए भी हम तक पहुंचा सकते हैं। आइडी है : chaupal.jansatta@expressindia.com

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App