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चौपाल: जाएं तो जाएं कहां

भारत में इस वक्त करीब सोलह हजार रोहिंग्या शरणार्थी हैं, जबकि केन्द्र सरकार के मुताबिक ये आंकड़ा चालीस हजार का है। इनकी मौजूदगी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक है। अकेले जम्मू में ही करीब दस हजार रोहिंग्या रहते हैं।

Author December 8, 2018 6:03 AM
रोहिंग्या शेल्टर कैंप में रहने वाले बच्चे (फोटो सोर्स- एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

रोहिंग्या शरणार्थियों के मसले पर सुनवाई अब जनवरी में होगी। भारत में रह रहे रोहिंग्या लोगों ने उन्हें वापस न भेजने की मांग की है। केंद्र सरकार की दलील है कि यह मसला आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा है, लिहाजा अदालत इसमें दखल न दे, जबकि देश में रह रहे रोहिंग्या लोगों ने अपने शिविरों में बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायत भी याचिका में की है। बहरहाल, इस पर जो भी फैसला आए, लेकिन ताज्जुब यह है कि दुनिया में कोई भी रोहिंग्या को जगह देने को तैयार नहीं है। संयुक्त राष्ट्र भी रोहिंग्या मुसलमानों को दुनिया का सबसे प्रताड़ित जातीय समूह मानता है, लेकिन वह भी उनकी मदद की दिशा में कुछ नहीं कर पा रहा। सरहदों की बंदिशों के बीच ये दोजख सरीखी जिंदगी जी रहे हैं।

रोहिंग्या की ज्यादातर आबादी सुन्नी मुसलमानों की है। रोहिंग्या का नाम देश में भले ही कुछ सालों से चर्चा में हो, लेकिन पड़ोसी देश म्यांमा और बांग्लादेश में ये नया नहीं है। रोहिंग्या सोलहवीं सदी से म्यांमा के रखाइन राज्य में रह रहे हैं, जो म्यांमा का सबसे गरीब प्रांत है। म्यांमा की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है, लिहाजा यहां भी बड़ी संख्या में बौद्ध रहते हैं जो रोहिंग्या को उनकी भाषा के कारण बंगाली (बांग्लादेश बाद में बना) मानते हैं। यह विवाद 1948 में म्यांमा के आजाद होने के बाद से ही चला आ रहा है। रोहिंग्या की संख्या बढ़ती देख म्यांमार सरकार ने 1982 के राष्ट्रीयता कानून में रोहिंग्या का नागरिक दर्जा खत्म कर दिया, जिसका नतीजा 2012 में देखने को मिला। इस साल रखाइन में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जिसमें सौ से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी और एक लाख से ज्यादा रोहिंग्या विस्थापित हुए।

बड़ी संख्या में रोहिंग्या आज भी जर्जर शिविरों में रह रहे हैं। इन लोगों के पास कोई अधिकार नहीं है। ये न कहीं आ जा सकते हैं, न ही काम कर सकते हैं। म्यांमा में उनकी कहीं सुनवाई नहीं है। 2012 में शुरू हुई धार्मिक हिंसा और सैन्य कार्रवाई के बाद करीब आठ लाख रोहिंग्या ने रखाइन प्रांत छोड़ दिया। बांग्लादेश इनमें से कुछ को शरणार्थी मानने को तैयार है, लेकिन सभी को लेने के लिए वो भी राजी नहीं। भारत के अलावा रोहिंग्या थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, नेपाल ,चीन, सऊदी अरब और अमेरिका तक पहुंच गए हैं। मानवाधिकार समूहों ने कई बार म्यांमार को आगाह किया है कि वो इन्हें इनका उचित स्थान दे, लेकिन वहां सत्ताधारी पार्टी की नेता आंग सान सू की की सरकार इसे अनसुना कर देती है। भारत में इस वक्त करीब सोलह हजार रोहिंग्या शरणार्थी हैं, जबकि केन्द्र सरकार के मुताबिक ये आंकड़ा चालीस हजार का है। इनकी मौजूदगी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक है। अकेले जम्मू में ही करीब दस हजार रोहिंग्या रहते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि इंसानियत के नाते इनमें बेहद जरूरतमंद ऐसे लोगों को देश में आश्रय मिल जाए जो देश की सुरक्षा के लिए कोई खतरा न हों? अगर ऐसा होता है तो ये दुनिया भर के सामने एक मिसाल होगी।
नवीन पाल, दिल्ली

किसानों पर राजनीति: अपनी मांगों को लेकर किसानों ने पिछले दिनों दिल्ली में डेरा डाला था। ये किसान कृषि संकट से निपटने के लिए कानून बनाने की मांग को लेकर दिल्ली आए थे। किसानों के बार-बार आंदोलन की बड़ी वजह है कि उनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। किसानों की समस्याएं कोसों दूर पीछे छूट गई हैं। किसानों की आड़ में राजनीतिक दल अपनी चुनावी रोटियां सेकने में लगे हैं। आजादी के बाद सरकारें आती-जाती रहीं, लेकिन अन्नदाता वैसा ही बेहाल और परेशान है।

देश के सभी राजनीतिक दल चाहे वह सत्ता पक्ष के हो या विपक्ष के, सब को एक साथ अपने मन में एक सकारात्मक व सहानुभूति की सोच को उत्पन्न करके यह सोचना चाहिए कि किसान और कृषि को समृद्धि के रास्ते पर कैसे लाया जाए। इसका बकायदा एक मास्टर प्लान बनाना होगा। सिर्फ किसानों को चुनावी फायदे के लिए आर्थिक मदद देने, कर्ज माफी जैसे झुनझुने से उनका भविष्य नहीं चलेगा, बल्कि एक दूरगामी नीति बना कर सुनिश्चित करना होगा कि उनकी फसल को अधिकतम मूल्य मिले, सिंचाई, खाद, बिजली, बुआई, फसल बीमा, आपात स्थिति में मदद की पहल को सबसे निचले स्तर तक पहुंचाने का काम करना होगा। वरना तो ऐसे ही किसानों की समस्या पर अपने सियासत गर्म करने वाले आगे निकलते रहेंगे और किसान दो जून की रोटी के लिए भी तरस जाएगा।
अमन सिंह, बरेली

बच्चों की फिक्र: आधुनिकता से भरे इस युग में आज मनुष्य अपने भौतिकतावादी स्वार्थों को पूरा करने की अंधाधुंध दौड़ में अपनी आध्यात्मिक संस्कृति, रीति रिवाज आदि को कहीं पीछे छोड़ चुका है। हालांकि लोगों में अभी भी इसके प्रति लगाव प्रतिबिंबित होते हैं, लेकिन वर्तमान पीढ़ी के बच्चे अपना बचपन महाभारत, रामायण व सांस्कृतिक विरासत की कहानियों को अपने पूर्वजों से नहीं सुन कर मोबाइल, लैपटॉप में जैसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसओं में व्यतीत करते हैं। इससे उनका करुणा, मर्यादा, ईमानदारी, सम्मान, उपकार आदि शब्दों से शायद ही परिचय होगा। इसलिए आज के बच्चों में नैतिक मूल्यों के प्रति जीवंतता का विस्तार करने के लिए विद्यालयों में एक कालांश नैतिकता के ऊपर प्रयोग का भी चलना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी को भटकने से बचाया जा सके।
श्रवण कुमार गुप्ता, इलाहाबाद विवि

आइंस्टीन और ईश्वर: ईश्वर है, इस बात से कोई भी इंकार नहीं करता। कोई इसे ‘आकार’ रूप में मानता है तो कोई ‘निराकार’ रूप में। इसी संबंध में हाल में प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का एक पत्र करीब बीस करोड़ रुपए में बिका है। यह पत्र उन्होंने अपने निधन से एक साल पहले एक जर्मन दार्शनिक को लिखा था। उन्होंने भी ईश्वर को स्वीकारा है अपने दर्शन में। यह भी कहा है कि मानवरूपी धर्म और ग्रंथ दंत कथाएं हैं, प्रकृति की खूबसूरती को संचालित करने वाला ही ईश्वर है, जो निराकार है। यह बात सच है कि करीब-करीब सभी धर्मग्रंथ मानव रचित हैं। प्रकृति का रचयिता तो ईश्वर ही है। हालांकि कई मत प्रकृति को ही ईश्वर मानते हैं जिसमें पृथ्वी, आकाश, जल, वायु, अग्नि (पंचतत्व) होते हैं। ईश्वर मुख्य रूप से प्रकृति ही है।
शकुंतला महेश नेनावा, इंदौर

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