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चौपाल: खतरे में नदियां

नदियों को प्रदूषित करने का सबसे बड़ा कारण शहरों में सीवर का गंदा पानी व औद्योगिक फैक्ट्रियों से निकलने वाले घातक रसायन हैं जो इन नदियों में प्रवाहित किए जा रहे हैं। इसके अलावा नदियों में मानव शव, पशुओं के शव, कचरा और प्लास्टिक कचरा भी प्रदूषण को बढ़ा रहा है।

Author December 7, 2018 6:31 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

भारतीय संस्कृति में नदियों को मां समान बताया गया है। नदियों को पूज्य मान कर उन्हें एक जीवित देवी का दर्जा दिया गया है। पहाड़ से निकलने के दौरान नदियों में कई औषधियां मिल जाती हैं जिस वजह से इन का जल औषधीय गुणों से युक्त हो जाता है और कई गंभीर बीमारियों में बहुत ही ज्यादा कारगर साबित होता होता है। इसीलिए नदी जल को अमृत के समान बताया गया है। लेकिन दुख की बात है कि आज प्रदूषण की वजह से इन जीवनदायिनी नदियों के जीवन पर ही संकट खड़ा हो गया है और उन्हें खुद को जीवित रखने के लिए भारी जद्दोजहद का सामना करना पड़ रहा है। हालत इतनी गंभीर है कि देश की अधिकांश नदियां प्रदूषण की वजह से गंदे नाले में तब्दील हो चुकी हैं। जिन नदियों के जल से बीमारियों का इलाज होता था, उन्हीं नदियों के पानी से आज गंभीर और जानलेवा बीमारियां पनप रही हैं।

नदियों को प्रदूषित करने का सबसे बड़ा कारण शहरों में सीवर का गंदा पानी व औद्योगिक फैक्ट्रियों से निकलने वाले घातक रसायन हैं जो इन नदियों में प्रवाहित किए जा रहे हैं। इसके अलावा नदियों में मानव शव, पशुओं के शव, कचरा और प्लास्टिक कचरा भी प्रदूषण को बढ़ा रहा है। देश की सबसे बड़ी व सबसे पूज्य नदी गंगा प्रदूषण के मामले में अग्रिम पंक्ति में खड़ी दिखाई पड़ती है। इस नदी के बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए नमामि गंगे नाम की योजना शुरू की गई, लेकिन अरबों रुपए खर्च करने के बावजूद भी गंगा की सफाई व्यवस्था में कोई खास उन्नति देखने को नहीं मिलती है। अगर जल्द ही नदियों को प्रदूषित होने से रोकने के इंतजाम नहीं किए गए तो भविष्य में इन नदियों के अस्तित्व के साथ साथ मानव जाति के अस्तित्व पर भी एक भारी संकट खड़ा हो जाएगा।
अभिषेक मिश्रा, बरेली

प्रदूषण से निजात: दो दिसंबर को हम राष्ट्रीय प्रदूषण रोकथाम दिवस के रूप में मनाते हैं। इसे भोपाल गैस त्रासदी की याद में मनाया जाता है। पर सवाल है क्या इस पर सिर्फ नारेबाजी, विज्ञापनों या भाषणबाजी तक सीमित रह जाने से या इसे सिर्फ एक दिवस एक रूप में मनाने से हमारी जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी? वर्तमान में प्रदूषण की स्थिति भयावह है। आज विश्व में प्रदूषण के सूचकांक में सबसे ज्यादा प्रभावित शहर भारत के ही हैं।
वर्तमान में शहरीकरण के विकास की परिभाषा में चौड़ी सड़कें, फ्लाईओवर, रिंग रोड, मेट्रो, चमकते मॉल, कारपोरेट अस्पताल और विश्वस्तरीय स्कूल तो हैं, पर जीवन के दो सत्य हवा और पानी नदारद हैं। यह सर्वज्ञात तथ्य कि जब भूजल व नदी का पानी पीने योग्य न हो तब इन पर अंकुश लगाने की जरूरत है, क्योंकि प्रदूषण का पहला पायदान हम पार कर जीवन को खतरे के निशान के ऊपर ले गए हैं। सरकार और जनभागीदारी से पर्यावरण को स्वच्छ बनाने व प्रदूषण सूचकांक से लगे काले धब्बे को देश को मुक्त कराना होगा।
राहुल कपूर, इलाहाबाद

अस्तित्व पर सवाल: हाल ही में यूरोपीय यूनियन के नेताओं ने ब्रेक्जिट समझौते पर मुहर लगा कर पूरी वैश्विक बिरादरी को हैरानी में डाल दिया है। अब 28 सदस्यीय यूरोपीय यूनियन से ब्रिटेन के अलगाव के रास्ते में ब्रिटिश संसद ही बाधा रह गई है। माना जा रहा है कि दिसंबर में ब्रिटेन की संसद में इस पर मतदान हो सकता है। अगर इस समझौते को ब्रिटेन की संसद की मंजूरी मिल जाती है तो अगले साल 29 मार्च को ब्रिटेन औपचारिक रूप से यूरोपीय यूनियन से अलग हो जाएगा। गौर से अगर कुछ वैश्विक घटनाओं मसलन ब्रेक्जिट, व्यापार युद्ध और अमेरिका फर्स्ट जैसी नीतियों को समझने का प्रयास करें तो हम पाएंगे कि इन घटनाओं ने न सिर्फ 1991 में हुए वैश्वीकरण व उदारीकरण संबंधी ऐतिहासिक सुधारों को चुनौती देने का काम किया है, बल्कि विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अस्तित्व पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। अब ऐसे वैश्विक परिदृश्य में यह सवाल भी उठना स्वभाविक ही है कि क्या वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ब्रेटन वुड्स के नाम से जाने वाली विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का कोई महत्त्व नहीं रह गया है? क्या इन संस्थाओं को खत्म कर देना चाहिए?

इन वैश्विक संस्थाओं का विघटन इसलिए भी संभव नहीं है क्योंकि आज विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए, भारत की अर्थव्यवस्था को जहां रोजगार सृजन के लिए अधिक से अधिक उद्योग धंधों की आवश्यकता है, वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक बिरादरी को बाजार उपलब्ध कराने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसी परिस्थिति में इन संस्थाओं की भूमिका कम नहीं बल्कि बढ़ी है।
विनोद राठी, महर्षि दयानंद विवि, रोहतक

शर्मनाक अराजकता: बुलंद शहर के पास तथाकथित गोरक्षकों ने जो हिंसा फैलाई वह वास्तव में शर्मनाक ही कही जाएगी। कानून हाथ में लेने और हिंसा करने पर आमादा हो जाना क्या ठीक है? आखिर नतीजा क्या हुआ? पुलिस अधिकारी की हत्या हो गई। हिंसा में कुछ लोग घायल हो गए। भारी नुकसान हुआ। और इन सबसे ज्यादा तो समाज का माहौल बिगड़ गया। आखिर इन सबसे नतीजा क्या निकलेगा? गोहत्या की आड़ में पहले भी इसी तरह की घटनाएं देश के अन्य भागों में घट चुकीं हैं। कुछ लोग इन्हें जानबूझकर अंजाम देते हैं ताकि समाज बंटे और उनकी राजनीति व दुकानदारी चलती रहे। ऐसी विभाजनकारी ताकतों से सावधान रहने की जरूरत है। सरकार को ऐसी घटनाओं के प्रति सजग रहना चाहिए, और राजनीतिक बयानबाजी के बजाय तत्काल कठोर कदम उठाना चाहिए।
महेश नैनवा, इंदौर

कठघरे में ईवीएम: हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है, और जनता द्वारा चुने गए व्यक्ति ही हमारे देश में शासन करता है। लेकिन जब से ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं, तब से लोकतंत्र की चुनाव जैसी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई है। ईवीएम से जुड़ी जो शिकायतें आई हैं उनमें कहा गया है कि लोग किसी भी पार्टी को वोट देते हैं तो भी वोट सिर्फ एक पार्टी विशेष को ही जाता है। जाहिर है, ईवीएम में छेड़-छाड़ के बिना ऐसा संभव नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब चुनाव ही निष्पक्ष नहीं होंगे तो लोकतंत्र की पवित्रता कैसे बरकरार रह पाएगी?
रोशन कुमार, कोरबा, छत्तीसगढ़

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