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चौपाल: आरक्षण में सेंध

आरक्षण का प्रावधान इस लक्ष्य के साथ किया गया था कि जो ऐतिहासिक रूप से शोषित और पिछड़े रह गए उनका भी प्रतिनिधित्व सरकारी सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में सुनिश्चित हो सके। लेकिन विडंबना देखिए कि सामान्य वर्ग, जो अपनी जनसंख्या से अधिक प्रतिनिधित्व रखता है, उसे ऊपर से आरक्षण भी दिया जा रहा है।

Author Published on: February 8, 2019 5:24 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

पिछले दिनों सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीब तबकों के लिए नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में दस प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान कर दिया। इसके लिए संविधान में संशोधन कर ‘आर्थिक आधार’ को भी पिछड़ेपन का कारण बनाया गया जबकि मूल संविधान में केवल सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन पर आरक्षण का प्रावधान था। सत्तारूढ़ दल जोर-शोर से ढिंढोरा पीट रहा है जबकि विपक्ष, जिसमें तथाकथित पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल भी हैं, भी तथाकथित सवर्णों के वोट के लिए इस नई आरक्षण व्यवस्था का समर्थन कर अपने योगदान के लिए श्रेय लेने में लगा है। तर्क है कि इस नई व्यवस्था के कारण पहले से आरक्षण प्राप्त तबके को कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन गहराई से विश्लेषण करने पर साफ हो जाता है कि यह नई आरक्षण की व्यवस्था सीधे आरक्षण के सिद्धांत पर चोट है। दरअसल, आरक्षण का सिद्धांत प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। लेकिन सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान कर इसे गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम बना दिया।

आरक्षण का प्रावधान इस लक्ष्य के साथ किया गया था कि जो ऐतिहासिक रूप से शोषित और पिछड़े रह गए उनका भी प्रतिनिधित्व सरकारी सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में सुनिश्चित हो सके। लेकिन विडंबना देखिए कि सामान्य वर्ग, जो अपनी जनसंख्या से अधिक प्रतिनिधित्व रखता है, उसे ऊपर से आरक्षण भी दिया जा रहा है। हाल ही में द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित आंकड़े भी सामान्य वर्गों के ‘ओवर रिप्रजेंटेशन’ यानी अधिक प्रतिनिधित्व को पुष्ट करते दिखे। आरक्षण को गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम बनाना आरक्षण व्यवस्था पर सीधा हमला और इसके उद्देश्य को धूमिल करना है। आरक्षण का उद्देश्य धूमिल होने से सीधा नुकसान अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दलितों को होगा। गणितीय दृष्टिकोण से देखें तो अब पहले की तुलना में अनारक्षित सीटों की संख्या घटेगी। मसलन, 100 में से 40 सीटें ही अनारक्षित रहेंगी जो पहले 50 होती थीं। परिणामत: अनारक्षित सीटों से चयनित होने के लिए पिछड़े तबकों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और संभावना कम होगी।

इन सबके उलट दुखद बात है कि पिछड़े वर्गों के नुमाइंदे विरोध में सामने आने के बजाय सवर्णों के तर्कों में फंस कर हां में हां मिला रहे हैं। हमारे समाज की सच्चाई है कि तथाकथित उच्च जातियां हमेशा से आरक्षण विरोधी रही हैं। उनका प्रयास रहा है कि या तो आरक्षण खत्म हो या उन्हें भी मिले क्योंकि सबको आरक्षण मिलने का अर्थ हुआ कि किसी को आरक्षण नहीं मिला!
राहुल राज, नवादा, बिहार

सियासी बिसात: लोकसभा चुनाव की आहट भर से राजनीतिक दलों ने बिसात बिछा कर शह और मात का खेल शुरू कर दिया है! सबसे खास पहलू इस खेल का यह है कि हमेशा की तरह मोहरा जनता ही रहेगी। इस मोहरे का इस्तेमाल कैसे किया जाए ये राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से कूटनीति बनाने में जुटे हुए हैं। अब राजनीतिक दलों की जातिगत समीकरण की बजाय धार्मिक समीकरण पर ज्यादा तवज्जो है। नफरत फैलाने में कई दलों की भागीदारी सबके सामने ही है! घर मुसलमान का जले तो रोए हिंदू या फिर घर हिंदू का जले रोए मुसलमान- वाली संस्कृति अब दुर्लभ हो चली है।

विडंबना है कि राजनीतिक दलों के नेता सेक्युलरिज्म लबादा ओढ़ कर सांप्रदायिकता का घिनौना तमाशा दिखाने को बेताब रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव करीब आएंगे इन नेताओं के सीने के ताले खुलते जाएंगे। लेकिन अब बड़ा सवाल है कि क्या जनता इन राजनीतिक दलों के झांसे में न आकर मुल्क की सेक्युलर और राष्ट्रवाद की बुनियाद को मजबूत करने में अपनी भूमिका अदा करेगी?
मोहम्मद फारूक सुलेमानी, बालोतरा, राजस्थान

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