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चौपाल: दुराव से दूर

कहीं ऐसा न हो कि तर्क-वितर्क में तो हम जीत जाएं मगर हमारे आपसी रिश्तों में दरार पड़ जाए! चुनाव तो हर पांच साल में आते-जाते रहेंगे लेकिन दोस्त और हितैषी वर्षों की साधना के बाद ही मिलते हैं।

Author February 12, 2019 5:57 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

राजनीति का बाजार गरमाने लगा है। इस गर्माहट में हमारे आपसी रिश्ते खराब न हों, इस बात का ध्यान रखने की जरूरत है। मान लिया हमारा कोई साथी राजनीतिक प्रतिबद्धता की वजह से अपनी एक अलग विचारधारा रखता है तो इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वह शख्स हमसे नाराज है और बदले में हम भी उससे दुराव रखें। कहने कीआवश्यकता नहीं कि हमारी मुसीबत में सिर्फ हमारे दोस्त, रिश्तेदार या पड़ोसी ही काम आएंगे, कोई नेता नहीं। इसलिए राजनीति पर बेवजह आवेश में आकर बहस करके हम अपने दोस्ताना ताल्लुकात पर क्योंकर आंच आने दें? कहीं ऐसा न हो कि तर्क-वितर्क में तो हम जीत जाएं मगर हमारे आपसी रिश्तों में दरार पड़ जाए! चुनाव तो हर पांच साल में आते-जाते रहेंगे लेकिन दोस्त और हितैषी वर्षों की साधना के बाद ही मिलते हैं।
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

कुपोषण के विरुद्ध: भारत में कुपोषण से निपटने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के मकसद से विभिन्न योजनाएं चलाई गर्इं लेकिन समस्या की विकरालता को देखते हुए वे नाकाफी तो थीं ही, व्यवस्थागत, प्रक्रियात्मक विसंगतियों और भ्रष्टाचार की वजह से तकरीबन बेअसर भी साबित हुई हैं। दरअसल, भूख से बचाव यानी खाद्य सुरक्षा के तहत सभी नागरिकों को जरूरी पोषक तत्त्वों से परिपूर्ण भोजन उनकी जरूरत के हिसाब से समय पर और गरिमामय तरीके से उपलब्ध करना किसी भी लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी सरकार का पहला दायित्व है। लेकिन हमारे देश में भूख और कुपोषण की समस्या आज भी विकराल बनी हुई है। सरकार ने अपने स्तर पर प्रयास तो बहुत किए है लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है। कुपोषण के कारण विकलांग बच्चे दिखने को मिलते हैं। सरकार को कुपोषण दूर करने के लिए तत्काल प्रभावी उपाय करने चाहिए।
मोहम्मद असिफ, दिल्ली विश्वविद्यालय

चुनावी वायदे: विपक्ष में रह कर सरकार की आलोचना करना और उसके विरुद्ध किसी की उचित-अनुचित मांग का आंख मींच कर समर्थन करना बहुत आसान होता है। कांग्रेस ने राजस्थान में विपक्ष में रहकर गुर्जर आरक्षण का खुल कर समर्थन किया था और वायदा किया था कि यदि वह प्रदेश में सत्ता में आई तो तुरंत गुर्जर आरक्षण को मंजूरी देगी। अब चूंकि कांग्रेस राजस्थान में सत्ता में आ चुकी है तो गुर्जरों ने अपनी पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग याद दिलाई, मगर अब कांग्रेस इस पर टालमटोल कर रही है। जो बात या मांग स्वीकार करने के योग्य न हो, उसका अपने राजनीतिक फायदे के लिए प्रयोग करना कहां तक सही है! गुर्जर आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस ने लगभग हाथ खड़े कर दिए हैं और कहा है कि यह मुद्दा तो केंद्र सरकार का है और गुर्जरों को प्रधानमंत्री से गुहार लगानी चाहिए। यानी अब जबकि गुर्जरों के वोट उसने हासिल कर लिए तो केंद्र का बहाना बनाकर इस मुद्दे से पल्ला झाड़ रही है!

आज की राजनीति का स्वरूप ‘एक हाथ से ले- दूसरे हाथ से दे’ का हो गया है। वोट लेने के बाद मतदाता को तुरंत पुरस्कृत करना पड़ेगा वरना आंदोलनों के कारण कानून-व्यवस्था को कायम रखना मुश्किल साबित होता है। कांग्रेस सहित सभी दलों को चाहिए कि चुनाव-पूर्व वही वायदे किए जाएं जो उनके अधिकार क्षेत्र में हों और जिनके कारण प्रदेश और देश के अन्य नागरिकों के हितों का हनन न हो। मतदाताओं को बरगलाने की नीति बंद होनी ही चाहिए।
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, नई दिल्ली

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