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चौपाल: मैरी की मिसाल

एक 36 वर्ष की महिला, जो तीन बच्चों की मां हो, उसके लिए बाईस वर्ष की युवती से मुकाबला करना कितना कठिन है, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। मैरी कॉम पर आज पूरे भारत को गर्व हो रहा है। उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं से जूझते हुए अपनी इस उपलब्धि से न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर की महिलाओं के लिए मिसाल कायम की है।

Author November 27, 2018 5:41 AM
विश्व की सबसे सफल महिला मुक्केबाज मैरी कॉम।

भारत की मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम ने बीते शनिवार को विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में इतिहास रच दिया। उन्होंने लाइट फ्लाइवेट (45-48 किलोग्राम) वर्ग के फाइनल में यूक्रेन की हाना ओखोता को 5-0 से हराकर छठा विश्व खिताब हासिल किया है। इस खिताब के साथ ही वे दुनिया की सबसे सफल महिला मुक्केबाज बन गई हैं। मैरी कॉम ने इस खिताबी मुकाबले में अपने अनुभव का पूरा लाभ उठाते हुए योजनाबद्ध तरीके से आक्रमण और रक्षण का सही मिश्रण पेश किया। इस जीत के जरिए उन्होंने आयरलैंड की कैटी टेलर (पांच विश्व खिताब विजेता) को पीछे छोड़ दिया है। गौरतलब है कि मैरी कॉम ने इससे पहले 2002, 2005, 2006, 2008 और 2010 में विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीते थे। इसके अलावा उन्होंने 2001 में रजत पदक भी हासिल किया था।

मणिपुर की मैरी कॉम का इस मुकाबले में पलड़ा भारी माना जा रहा था। ऐसा इसलिए कि उन्हें घरेलू दर्शकों का समर्थन तो मिला ही, पिछले दिनों वे इस यूक्रेनी मुक्केबाज को हरा चुकी थीं। इस मैच से पहले मैरी कॉम और आयरलैंड की केटी टेलर ने 5-5 बार स्वर्ण पदक हासिल किए थे। केटी टेलर अब प्रोफेशनल मुक्केबाज बन चुकी हैं। मैरी ने कुछ समय पहले पोलैंड में यूक्रेनी मुक्केबाज हाना को पराजित किया था। इस उपलब्धि के जरिए मैरी कॉम ने क्यूबा के महान पुरुष मुक्केबाज फेलिक्स सेवोन की बराबरी कर ली है। सेवोन ने 1986 से 1999 के बीच छह बार विश्व खिताब हासिल किया था और एक बार रजत पदक भी जीता था। वे 91 किलोग्राम वर्ग में लड़ते थे। महिला वर्ग में केटी टेलर ने 2006 से 2016 के बीच पांच बार विश्व खिताब हासिल किया था और एक बार कांस्य पदक अपने नाम किया था।

एक 36 वर्ष की महिला, जो तीन बच्चों की मां हो, उसके लिए बाईस वर्ष की युवती से मुकाबला करना कितना कठिन है, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। मैरी कॉम पर आज पूरे भारत को गर्व हो रहा है। उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं से जूझते हुए अपनी इस उपलब्धि से न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर की महिलाओं के लिए मिसाल कायम की है।
अभिजीत मेहरा, गोड्डा, झारखंड

आतंक के जख्म: मुंबई में हुए आतंकवादी हमले को दस साल बीत चुके हैं पर उसके जख्म अभी तक ताजा हैं। आज भी उस हमले को याद करके देशवासियों का दिल दहल जाता है कि कैसे महज दस आतंकवादियों ने मिलकर 180 मासूम लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उस हमले के गुनहगार अजमल कसाब को हमने बेशक फांसी पर लटका दिया पर क्या उसके सरगना का अब तक कुछ बिगाड़ पाए हैं? कसाब और अन्य आतंकी तो केवल मोहरे थे। असली खिलाड़ी तो अब भी आतंकवादियों के गढ़ पाकिस्तान की सड़कों पर आजाद घूम रहे हैं। उनका यों बेखौफ घूमना हम भारतीयों के लिए काफी पीड़ादायी है।

आज आतंकवाद की जड़ें विश्व में काफी तेजी से फैल रही हैं और वह दुनिया के सामने कैंसर से भी खतरनाक बीमारी के रूप में उभरा है। ऐसे में विश्वहित के समर्थक सभी देशों को आतंकवाद का एकजुट होकर मुकाबला करने की जरूरत है।
सिकंदर कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय

सौहार्द का गलियारा: यह स्वागतयोग्य है कि भारत और पाकिस्तान ने अपने तल्ख रिश्तों के बीच सीमा के दोनों ओर करतारपुर गलियारे के निर्माण की पहल की है। इससे भारतीय पंजाब के गुरदासपुर स्थित डेरा बाबा नानक से पाकिस्तान में गुरद्वारा दरबार साहिब करतारपुर तक श्रद्धालु आ-जा सकेंगे। धर्म के कारण ही हम में बंटवारा हुआ। शायद धर्म के कारण ही हम भविष्य में एक हो जाएं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए यहां तक कह दिया कि, किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि बर्लिन की दीवार टूटेगी!
इस बात के गहरे निहितार्थ हैं। अगर हम पुरानी दुश्मनी को भूल जाएं तो फिर एक या करीबी दोस्त हो सकते हैं। हर किसी को इस उत्कृष्ट विचार पर गौर फरमाना चाहिए। आखिर हम पिछले इकहत्तर साल से एक संस्कृति, एक जुबान, एक रंग, एक रूप के होते हुए भी क्यों एक-दूसरे के दुश्मन बने बैठे हैं? अगर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश फिर से एक हो जाएं तो दक्षिण एशिया में हमारा रुतबा देखने लायक होगा।
जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

फर्जीवाड़े से दूर: मनीषा सिंह का लेख ‘फर्जीवाड़े के परिसर’ (25 नवंबर) शिक्षा के क्षेत्र में डिग्रियों के फर्जीवाड़े पर ध्यान आकर्षित करने के साथ ही इस संदर्भ में सुधार की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की ओर ध्यान दिलाता है। लेकिन जिस तरह से इस लेख की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से की गई वह समझ से परे है क्योंकि कोई भी छात्र संगठन ऐसे घिनौने कृत्य में न तो जानबूझ कर सहभागी बनना चाहेगा और न ऐसी चीजें को बढ़ावा देगा। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अपने नाम के अनुरूप ही अखिल भारतीय छात्र संगठन है जो पूरे भारत में छात्रों के बीच लोकप्रिय तथा कार्यरत है। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में एक फर्जी डिग्रीधारी व्यक्ति को अध्यक्ष का टिकट देकर बड़ी चूक तो हुई है, लेकिन उसे समय रहते सुधारा भी गया। एबीवीपी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष और विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता अंकित बसोया को न केवल प्राथमिक सदस्यता से निलंबित करते हुए संगठन से बाहर का रास्ता दिखाया बल्कि यह विज्ञप्ति भी जारी की कि दिल्ली विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने एबीवीपी के घोषणा पत्र और कैंपस में सक्रिय भूमिका को देखकर हमें समर्थन किया है, उसके साथ डूसू अध्यक्ष ने न्याय नहीं किया, इसके लिए वह कठोर कार्रवाई का हकदार है।

एक छात्र संगठन के रूप में विद्यार्थी परिषद की सीमाएं यहीं तक हो सकती हैं। कार्यकर्ता बनाते समय शायद किसी की डिग्री जांचा जाना किसी भी सामाजिक संगठन में संभव नहीं होगा; एबीवीपी लाखों छात्रों-छात्राओं का संगठन है। शैक्षिक संस्थानों को डिग्रियां जांचने के लिए सुदृढ़ व्यवस्था अपनाते हुए इस दिशा में प्रक्रिया को आसान बनाया जाना चाहिए।
एसएससी स्कैम हो या कोई अन्य फर्जीवाड़ा, एबीवीपी हमेशा सत्य के साथ खड़ा रहा है लिहाजा, इस तरह के फर्जीवाड़े में विद्यार्थी परिषद को खींचा जाना अनुचित है।
आशुतोष सिंह, एबीवीपी, दिल्ली

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