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चौपाल: भाषायी गुलामी

मैकाले ने अंग्रेजी की दासता से हमें इतना बांध दिया है कि हिंदी बोलने वाला और सामने बैठा व्यक्ति जो अच्छी तरह हिंदी समझ सकता है- दोनों अंग्रेजी के धाराप्रवाह वार्तालाप से अपने स्टेटस यानी हैसियत और कुलीन व्यक्तित्व की रक्षा में मिथ्या मर्यादा के पालन में पारंगत बने दिखते हैं।

Author February 5, 2019 6:35 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

चौबीस जनवरी के अंक में ‘हिंदी बनाम अंग्रेजी’ लेख में समाज में व्याप्त हिंदी की स्थिति पर चर्चा सामयिक तो है ही, यह आत्मचिंतन के भी योग्य है। यह सही है कि पश्चिमी और अंग्रेजी भाषा से वैश्विक ज्ञान की गंगा में हम तैर सकते हैं लेकिन ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ की करुण भूमिका ने भी हिंदी को अपने घर में कैद कर रखा है। मैकाले ने अंग्रेजी की दासता से हमें इतना बांध दिया है कि हिंदी बोलने वाला और सामने बैठा व्यक्ति जो अच्छी तरह हिंदी समझ सकता है- दोनों अंग्रेजी के धाराप्रवाह वार्तालाप से अपने स्टेटस यानी हैसियत और कुलीन व्यक्तित्व की रक्षा में मिथ्या मर्यादा के पालन में पारंगत बने दिखते हैं। मुझे याद है कि 1981 में बिहार प्रशासनिक सेवा में प्रवेश के तुरंत बाद प्रशिक्षण वर्ग में एक अतिथि व्याख्याता ने आते ही हम सब प्रशिक्षण पाने वालों से पूछा था- आप लोगों से हिंदी या अंग्रेजी में से किस भाषा में बात करूं? इसके जवाब में 90 फीसद पदाधिकारियों ने नौकरशाही की मजबूत चादर ओढ़े अंग्रेजी में ही बात करने का आग्रह किया था जबकि हम सब पर अपने राज्य में हिंदी में ही सरकारी कार्यों के संचालन की जिम्मेवारी थी। यह तो प्रशिक्षक महोदय की चतुराई रही कि उन्होंने कक्षा में हिंदी में ही बोलना शुरू किया यह कहते हुए कि ‘त्रुटियां हिंदी और अंग्रेजी दोनों में होती हैं!’

हिंदी प्रदेशों में शीर्ष नौकरशाही आज भी अंग्रेजी का दामन पकड़े है। प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी आज भी उपेक्षा का शिकार बनी हुई है। करीब दो दर्जन विदेश यात्राओं का मेरा अनुभव साक्षी है कि हिंदी भाषी पर्यटक भी अपनी आन, बान और शान की रक्षा में हिंदी में बात नहीं कर अंग्रेजी की मान-मर्यादा के प्रतीक बने हुए पाए गए। दिल्ली से पटना आने वाले अधिकतर अंग्रेजी समाचार पत्र रोज हवाई जहाज से पहुंच कर अपने अभिजात श्रेणी के पाठकों को तृप्त कर रहे हैं जबकि हम जैसे सामान्य पाठक रेलगाड़ी से चलकर तीसरे दिन आने वाले हिंदी अखबारों का बासी स्वाद चख पाते हैं। जहां तक हिंदी दिवस के आयोजन से इसके सर्वांगीण प्रसार और इसे बहुमुखी स्वरूप देने का उद्देश्य है- यह कुछ समूहों तक सीमित होकर रह गया है। उपाय यही दिखता है कि हम अपने घर में कैद हिंदी को आजाद कर आत्महीनता से उबरने की चेष्टा करें।
अशोक कुमार, पटना, बिहार

विकास का माध्यम: तालियों की गड़गड़ाहट और वाह-वाह के बीच वित्तमंत्री पीयूष गोयल ने चुनावी साल का अंतरिम बजट पेश कर दिया है। सरकार ने अपने इस अंतरिम बजट में मध्य वर्ग का दिल जीतने की पूरी कोशिश की है और उसे सबसे बड़ा तोहफा देते हुए पांच लाख की सालाना आय को कर के दायरे से बाहर कर दिया है। इस बजट को समाज के लगभग हर तबके, मध्य वर्ग, किसान, महिला और रक्षा मोर्चे की कसौटी पर कसा जाए तो मौजूदा सरकार की सफलता के तौर पर ही इसे देखा जाना चाहिए। सत्ता पक्ष इसे यों ही विपक्ष पर लक्षित हमले यानी सर्जिकल स्ट्राइक के तौर पर नहीं देख रहा है। कुछ दिन बाद होने वाले आम चुनाव में इन बजट प्रावधानों का लाभ सत्ता पक्ष को कितना मिल पाएगा यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन हालिया पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और रफाल जैसे मुद्दे पर सियासत करने वाले विपक्ष के लिए चुनौतियां तो बन ही गई हैं।

बहरहाल, चुनाव को ध्यान में रखते हुए भी इसे विकास के व्यापक नजरिए और कार्ययोजनाओं वाले बजट की संज्ञा देना गलत नहीं होगा। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा कि यह सिर्फ अंतरिम बजट नहीं बल्कि देश की विकास यात्रा का माध्यम है। चुनाव बाद कोई भी पार्टी सत्ता में आती है और इन योजनाओं को अमली जामा पहनाती है तो यह निश्चित ही समाज के सभी वर्गों को बेहतर जिंदगी देने के साथ ही भारत को पूरी तरह सुरक्षित और दुनिया में प्रभावशाली देश के तौर पर खड़ा करने में मददगार साबित होगा।
अमन सिंह, प्रेमनगर, बरेली, उत्तर प्रदेश

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