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चौपाल: क्रांति की शर्त

एनएसएसओ की रिपोर्ट कहती है कि देश के कुल कार्यबल में केवल पांच फीसद लोग औपचारिक रूप से प्रशिक्षित हैं, और महज दस फीसद लोग डिजिटल रूप से साक्षर हैं। जैसा कि हम जानते हैं, चौथी औद्योगिक क्रांति, जो उन्नत तकनीक पर आधारित है, उसके संचालन के लिए...

Author February 13, 2019 5:10 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

इन दिनों कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, ब्लॉक चेन, इंटरनेट आॅफ थिंग्स और बिग डेटा आदि जैसी उन्नत तकनीक पर आधारित चौथी औद्योगिक क्रांति की बहुत चर्चा हो रही है। कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने भी विश्व आर्थिक मंच के ‘चौथी औद्योगिक क्रांति केंद्र’ की शुरुआत के मौके पर कहा था कि हमारा देश इस नई क्रांति के लाभ उठाने के लिए तैयार है। यहां गौरतलब है कि पहली औद्योगिक क्रांति पानी व भाप की शक्ति के कारण और दूसरी विद्युत शक्ति के कारण संभव हो पाई जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो सका। इन दोनों औद्योगिक क्रांतियों के समय भारत दुर्भाग्यवश उपनिवेशवाद का दंश झेल रहा था। उसके बाद तीसरी औद्योगिक क्रांति ने सूचना और प्रौद्योगिकी द्वारा स्वचालित निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

भारत के संदर्भ में अगर चौथी औद्योगिक क्रांति की बात करें तो निस्संदेह देश के भीतर हमारी विविधता, वृहद बाजार, विशाल युवा शक्ति, डिजिटल संरचना आदि वे सारी क्षमताएं मौजूद हैं जो देश को विकासशील से विकसित बना सकती हैं। लेकिन इन सबके बावजूद हमारे सामने कई असुविधाजनक प्रश्न भी खड़े हैं। मसलन, क्या कौशल आधारित तकनीकी परिवर्तन नौकरियों को कम करेगा जबकि वर्तमान समय में भारत बेरोजगारी का दंश झेल रहा है? दूसरा, देश की अर्थव्यवस्था का लगभग नब्बे फीसद कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र के तहत कार्यरत है। आधी से अधिक आबादी कृषि और उससे संबद्ध गतिविधियों में संलग्न है। एनएसएसओ की रिपोर्ट कहती है कि देश के कुल कार्यबल में केवल पांच फीसद लोग औपचारिक रूप से प्रशिक्षित हैं, और महज दस फीसद लोग डिजिटल रूप से साक्षर हैं। जैसा कि हम जानते हैं, चौथी औद्योगिक क्रांति, जो उन्नत तकनीक पर आधारित है, उसके संचालन के लिए कौशल विकास पूर्व निर्धारित शर्त है। दूसरी तरफ सरकार द्वारा लागू की गई कौशल विकास योजनाएं विफल क्रियान्वयन की शिकार हैं और केवल अब तक कागजों में सफल हैं। ग्रामीण युवाओं तक ये योजनाएं अब भी नहीं पहुंच पाई हैं।

व्यवहार के धरातल पर देखें तो कई देशों में अनेक ऐसी समस्याएं मौजूद हैं जिनके चलते चौथी औद्योगिक क्रांति के अवसर का लाभ उठाने में हमें अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। लिहाजा, इन चुनौतियों का प्रबंधन मानव पूंजी में अधिक निवेश और भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश के लिए बफर बनाने, असमानता दूर करने, लिंग भेदभाव और मशीन लर्निंग आदि विषयों में शिक्षित करके बेहतर तरीके से कर सकते हैं। वर्तमान समय भारत के पास अपने भविष्य को आकार देने के लिए स्वर्णिम अवसर है। वह नई औद्योगिक क्रांति के दौर में अधिक लाभ उठा सकता है, बशर्ते नीति निर्माण का केंद्र बिंदु जनसांख्यिकीय लाभांश और तकनीकी परिवर्तन द्वारा उत्पन्न अवसरों को लक्षित करे।
पुष्पेंद्र पाटीदार, राऊ, जिला इंदौर

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