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चौपाल: जांच पर आंच

सीबीआइ की एंट्री रोकने पर याद आया कि मौजूदा प्रधानमंत्री जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, सीबीआइ उन्हें पूछताछ के लिए बुलाती थी तो वे पेश होते थे, सवालों के जवाब देते थे, लेकिन हमने कभी नहीं सुना कि उन्होंने सीबीआइ को रोकने जैसे किसी कदम पर चर्चा तक भी की थी।

Author Published on: February 6, 2019 5:50 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Source: PTI)

पश्चिम बंगाल में जो कुछ हुआ, वह अभूतपूर्व है। इसे सियासी ड्रामे के नजरिये से न देखें, बल्कि इस पर दुख जताइए क्योंकि यह एक ऐसे विवाद की बुनियाद है, जो आगे चल कर देश के संघीय ढांचे के लिए बहुत बड़ा खतरा बनने जा रहा है। इसमें शक नहीं कि सीबीआइ हमेशा से केंद्र की सत्ता की कठपुतली रही है, यही इसकी छवि है और यही इसकी सच्चाई भी है। यह बात हर वह राजनीतिक पार्टी कहती रही है जो विपक्ष में होती है और हर वह पार्टी जो सत्ता में होती है, यही कहती है कि सीबीआइ एक स्वायत्त संस्था है। बावजूद इसके ऐसा कभी नहीं देखा गया कि राज्य पुलिस सीबीआइ के अफसरों को हिरासत में ले ले और मुख्यमंत्री उस अधिकारी के साथ रात में ही पूरे दल-बल के साथ धरने पर बैठ जाएं जिससे सीबीआई को पूछताछ करनी थी! ममता बनर्जी ने जिस तरह सीबीआइ की कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, इसे राज्य बनाम केंद्र की जंग करार दे डाला, उससे हर कोई हैरान है। उन्होंने इसे केंद्र सरकार की गुंडागर्दी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के इशारे पर की गई छापेमारी बताया, लेकिन यह नहीं बताया कि एक पुलिस कमिश्नर से सीबीआइ अगर पूछताछ करना चाहती है तो इससे मुख्यमंत्री को क्या तकलीफ है?

सीबीआइ की एंट्री रोकने पर याद आया कि मौजूदा प्रधानमंत्री जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, सीबीआइ उन्हें पूछताछ के लिए बुलाती थी तो वे पेश होते थे, सवालों के जवाब देते थे, लेकिन हमने कभी नहीं सुना कि उन्होंने सीबीआइ को रोकने जैसे किसी कदम पर चर्चा तक भी की थी। अगर राजीव कुमार की जगह ममता बनर्जी से सीबीआइ ने पूछताछ की कोशिश की होती तब तो न जाने क्या हो जाता! ताजा मामले में ममता अगर सवाल उठातीं कि सारदा घोटाले में मुकुल रॉय के खिलाफ सीबीआई क्यों नहीं कार्रवाई कर रही है, उन्हें तृणमूल से भाजपा में जाने का फायदा क्यों मिल रहा है, तो उनका विरोध तार्किक लगता, लेकिन जिस गलत तरीके से वे 2019 का सियासी रास्ता तलाश रही हैं, वह अतार्किक है।

ममता एक जुझारू और लड़ाकू नेता हैं। बंगाल में वाम के खूनी राज का खात्मा करने का सेहरा उनके सिर पर है, लेकिन अब खुद उन पर खूनी राजनीति के आरोप लग रहे हैं। अब तक भाजपा कार्यकर्ताओं के खून का आरोप लग रहा था, लेकिन अब लोकतंत्र और संघीय ढांचे के खून के छींटे भी पड़ते साफ दिख रहे हैं। सियासी लड़ाई अपनी जगह है, सियासी जंग में कौन भारी यह फैसला तो बंगाल की जनता करेगी, लेकिन ममता बनर्जी जिस अफसर की रक्षक बन कर धरने पर बैठ गर्इं, उससे पूछताछ होकर रहेगी यह फैसला तो सुप्रीम कोर्ट ने सुना ही दिया है।
मो. ताबिश, जामिया मिल्लिया, नई दिल्ली

दुर्घटना की सड़क: सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ओर से चार से दस फरवरी तक सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जा रहा है। लोगों को यातायात नियमों के प्रति जागरूक करने और सड़क सुरक्षा उपायों की जानकारी देने के लिए यह कार्यक्रम हर वर्ष आयोजित किया जाता है। भारत में सड़क हादसों में मरने वालों की बढ़ती संख्या काफी चिंताजनक है। यातायात नियमों का पालन तो हर हाल में होना चाहिए, साथ ही बदतर सड़कों को ठीक करने की दिशा में भी सरकार को ठोस पहल करनी चाहिए। खराब सड़कें भी दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं। सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने की सार्थकता तभी है जब देश की सभी सड़कें गड््ढा मुक्त और सुरक्षा सुविधाओं से लैस हों। यातायात नियमों की अनदेखी पर जुर्माने के साथ ही खराब सड़कों के लिए निर्माण कंपनियों पर सख्ती से एक्शन लिया जाए, वरना हर साल सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाएगा और दुर्घटनाओं का सिलसिला भी यों ही चलता रहेगा।
जफर अहमद, रामपुर डेहरू, मधेपुरा, बिहार

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