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चौपाल: दावे पर संशय

सवाल यह भी है कि भारत जैसे देश में, जहां किसी न किसी राज्य में चुनावी माहौल बना रहता है, तो क्या आगे से सीबीआइ चुनाव के दिनों में अपनी जांच को रोक कर बैठ जाए? इस वाकये के बाद यकीनन सीबीआइ के आधिकारियों के मन में असुरक्षा की भावना बैठ जाएगी।

Author Published on: February 9, 2019 5:40 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (फोटो- एएनआई)

हम अक्सर सुनते आए हैं कि लोग जब हर तरफ से निराश हो जाते हैं तो बड़े भरोसे के साथ सीबीआइ जांच की मांग करते हैं और कहते हैं कि उसकी जांच में पूरी तरह से दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। सीबीआइ ने कई बार नामी चेहरों के खिलाफ सबूत लाकर उन्हें बेनकाब कर इसे साबित करके भी दिखाया है। सीबीआइ की बदौलत ही आज वे लोग जेल में सजा काट रहे हैं। लेकिन जिस तरह पश्चिम बंगाल में सीबीआइ अधिकारियों के साथ कोलकाता पुलिस पेश आई वह बेहद अफसोसनाक है। पुलिस के बर्ताव को देखकर ऐसा लगा जैसे वह किसी गंभीर आरोपी को रंगे हाथों गिरफ्तार कर चुकी हो! कायदे से तो वहां की पुलिस का फर्ज सीबीआइ आधिकारियों को सुरक्षा देने का था। पर हकीकत में हुआ इसके विपरीत। ममता बनर्जी का कहना था कि यह तख्तापलट की कोशिश है, अघोषित इमरजेंसी है! सीबीआइ के चालीस लोग जाकर भला कैसे तख्तापलट कर सकते हैं? क्या अब तक सीबीआइ ने जिन राज्यों में छापेमारी की वहां इमरजेंसी जैसे हालत बन गए?

सवाल यह भी है कि भारत जैसे देश में, जहां किसी न किसी राज्य में चुनावी माहौल बना रहता है, तो क्या आगे से सीबीआइ चुनाव के दिनों में अपनी जांच को रोक कर बैठ जाए? इस वाकये के बाद यकीनन सीबीआइ के आधिकारियों के मन में असुरक्षा की भावना बैठ जाएगी। वर्तमान समय में सीबीआइ कई बड़े मामलों की तहकीकात में जुटी है। आने वाले समय में वे लोग भी जांच से बचने के लिए कोई नया पाखंड रच सकते हैं। यदि सीबीआइ की कार्यशैली गलत थी तो ममता धरना देने की बजाय कोर्ट जाकर संवैधानिक जीत हासिल कर सकती थीं। उससे हर कोई उनकी तारीफ करता। सवाल यह भी है कि क्या ममता किसी गरीब के साथ हुई नाइंसाफीके खिलाफ भी सर्द रात में इतनी तत्परता दिखाने का कष्ट करेंगी?

चुनावों को लेकर तृणमूल कांग्रेस और केंद्र सरकार के बीच तनातनी को देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि सीबीआइ इस राजनीतिक विवाद में मोहरा बन गई। जैसे ही ममता धरने पर बैठीं कि देखते ही देखते धरनास्थल पर विपक्ष के कई नेता पहुंच गए। लेकिन फिर भी बड़े नेताओं ने वहां से दूरी बनाए रखी। शायद उन्हें ममता के पुलिस कमिश्नर के पाक-साफ होने पर यकीन नहीं था। इसके बाद अदालत ने भी पुलिस कमिश्नर को पूछताछ में सहयोग देने का आदेश देकर साफ कर दिया कि दाल में कुछ काला है। अदालत के आदेश से साफ है कि सीबीआइ बेवजह बंगाल नहीं पहुंची थी लेकिन फिर भी उसे बेइज्जत होना पड़ा। यदि कोलकाता के पुलिस कमिश्नर सबूतों को नष्ट करने के दोषी पाए जाते हैं तो क्या ममता सार्वजनिक मंच पर सीबीआइ से माफी मांगेंगी? चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों की मर्यादा तो पहले से ही गिर चुकी है। लेकिन अपनी छवि चमकाने के लिए इस तरह से जांच एंजेंसियों को रोकना ठीक नहीं कहा जा सकता। सीबीआइ को रोक कर ममता विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व जरूर कर सकती हैं, लेकिन गठबंधन की दिशा जनता ही तय करेगी। सारदा घोटाले में सबसे ज्यादा बंगाल की जनता के पैसे ही डूबे हैं। ऐसे में ममता का आरोपी के साथ चट्टान की तरह आकर खड़े होना उनकी ईमानदार राजनीति के दावे पर भी संशय पैदा करता है।
रोहित यादव, महर्षि दयानंद विवि, रोहतक

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