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ढोल की पोल

जहां तक उपलब्धियों का सवाल है, राजनेता इनका ढोल पीटने में कभी पीछे नहीं रहते। उपलब्धियां गिनाने के लिए जरूरी नहीं कि कुछ किया भी हो। असली और खांटी राजनेता तो वही- कि हर्र लगे न फिटकरी और रंग चोखा हो जाए। यानी बिना कुछ किए ही ढोल पीट कर ऐसी हवा बनाया जाए कि […]

Author June 8, 2015 3:45 PM

जहां तक उपलब्धियों का सवाल है, राजनेता इनका ढोल पीटने में कभी पीछे नहीं रहते। उपलब्धियां गिनाने के लिए जरूरी नहीं कि कुछ किया भी हो। असली और खांटी राजनेता तो वही- कि हर्र लगे न फिटकरी और रंग चोखा हो जाए। यानी बिना कुछ किए ही ढोल पीट कर ऐसी हवा बनाया जाए कि सभी को चारों ओर खुशहाली और हरा-भरा दिखने लगे। प्रचार इतना तगड़ा हो कि किसी को परेशानी दिखे ही न, खुदा न खास्ता किसी को तमाम प्रयत्नों के बावजूद कोई परेशानी दिख ही जाए तो उसे आंखों के इलाज के लिए अस्पताल जाना पड़े। अपनी उपलब्धियों की मार्केटिंग में हमारे प्रधानमंत्रीजी का तोड़ नहीं।

लेकिन प्रधानमंत्रीजी की कथित उपलब्धियों की जो हवा सभी विरोधी मिल कर नहीं निकाल पाए, वह काम प्रधानमंत्री कार्यालय ने बखूबी कर दिया। अमदाबाद के एक आवेदक ने सूचना अधिकार कानून के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से जानना चाहा कि मीडिया में आई खबरों के अनुसार, भारत सरकार 26 मई, 2015 को एक साल पूरा होने का जश्न मनाने जा रही है। कृपया वर्तमान भारत सरकार की एक साल की सबसे बड़ी बीस उपलब्धियां बताई जाएं। प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसर ने बकायदा लिख कर कह दिया कि इस संबंध में उसके पास कोई जानकारी मौजूद नहीं है।

इसका क्या मतलब समझा जाए? क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि जनाब जब आपके ही कार्यालय में उपलब्धियों की कोई जानकारी मौजूद नहीं है तो जनता की खून-पसीने की कमाई विज्ञापनों में क्यों फूंकी जा रही है?
श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल

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