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लोहिया के बहाने

वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रम राव का लेख ‘समाजवादी फिसलन और विचलन’ (22 जुलाई) पढ़ा। लोहियावादी पत्रकार के. विक्रम राव का दर्द इस लेख में झलक आया है। चूंकि मैं लोहिया साहित्य का अध्येता हूं और पीएचडी शोध का विषय ‘राममनोहर लोहिया का हिंदी साहित्य पर प्रभाव’ रहा है, इस वजह से लोहियाजी को उद्धृत किया हुआ कोई विचार अपनी ओर सहज खींच लेता है। जैसा कि इस लेख में लोहियाजी का विचार ‘खूंटी गाड़ो ताकि फिसलन कहीं तो थमे, वरना रसातल में जा पहुंचेंगे’ काफी प्रभावित किया।

राममनोहर लोहिया ने अपने जीवनकाल में ही समाजवादी फिसलन और विचलन को बखूबी पहचान लिया था। इस परिप्रेक्ष्य में एक वाक्य प्रस्तुत करना चाहूंगा। ‘लोहियाजी कानपुर के सर्किट हाउस में ठहरे थे। एक खांटी समाजवादी रामस्वरूप वर्मा उत्तर प्रदेश सरकार में वरिष्ठ मंत्री थे, उनसे मिलने आए। जब जाने लगे तो लोहियाजी उन्हें दरवाजे तक छोड़ने गए। लोहियाजी ने मंत्रीजी की कार को देख कर पूछा- झंडा लगी किसकी कार है?

मंत्रीजी ने बड़े ही संकोच भाव से कहा कि मैं आया था। उन्होंने डपटते हुए कहा ‘तुम लोग कल तक चप्पल घसीटते थे, अब इतनी बड़ी-बड़ी कारों से चलोगे। उन में और तुम में क्या फर्क है, पैदल जाओ, मंत्री होने का खुमार तो ढीला होगा।’ के. विक्रम रावजी का मूल चिंता उन में और तुम में के बीच निरंतर मिट रहे फासलों की तरफ इशारा करना है।

एक चमड़े का सूटकेश, कुछ किताबें लोहिया की जमा पूंजी रही। जीवन भर उन्होंने कोई घर नहीं बनाया। परिवार नहीं बनाया। किसी बैंक या डाकघर में कोई खाता नहीं खोला। जीवन भर अनिकेतन बने रहे। इस मिसाल की एक भी झलक लोहिया के परम अनुयायी होने का राग अलापने वाले सत्तासीन महानुभावों में ढूंढ़ना अपना वक्त जाया करना होगा। इनके पुत्र-पुत्री प्रेम, फार्म हाउस, और मुंबइया रंगमिजाजी के किस्से किसी से छिपे नहीं हैं। इसे समाजवादी विचलन कहेंगे या ढोंग- थोड़ा ठहर कर सोचना होगा।

लोहिया का कथन है कि ‘मनुष्य जाति का इतिहास सौ साल गाय का होता है तो एक साल शेर का। मनुष्य लगातार अन्याय बरदाश्त करता है तो जब यह स्थिति अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचती है तो वह इसका हिंसक प्रतिकार करता है। यह एक गलत प्रक्रिया है। होना यह चाहिए कि जिस समय छोटा-सा छोटा अन्याय किया जाए तत्काल उसके विरुद्ध प्रतिकार भी होना चाहिए।

इसी कड़ी से जोड़ कर हमें यादव सिंह जैसे भ्रष्टाचारियों को देखना होगा। लोहिया के विचारों के आलोक में यादव सिंह पर शुरुआती दौर में ही कार्रवाई की गई होती तो एक मामूली-सा जूनियर इंजीनियर पंद्रह वर्षों में ही मुख्य इंजीनियर तक का सफर तय नहीं करता, अरबों रुपए से न खेलता, उसकी मोटरकार की डिक्की से दस करोड़ रुपए बरामद न होता।
बालेंद्र कुमार, दिल्ली विवि, दिल्ली

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