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इतने अधीर

सत्तासुख यानी लाल बत्ती, टेलीफोन, गाड़ी-बंगला, उद््घाटन-आयोजन, मंगलाचरण, स्वागत के लिए उत्सुक भीड़, सुरक्षा का तामझाम, फोटो-खबर आदि का आनंद जब थम जाता है तो धीर से धीर और अनासक्तसे अनासक्त का अधीर हो उठना स्वाभाविक है। उसे अपने पुराने सुखदायी दिन याद आते हैं और वह सत्ता पक्ष की ऐसी हर सही-गलत घटना और […]

सत्तासुख यानी लाल बत्ती, टेलीफोन, गाड़ी-बंगला, उद््घाटन-आयोजन, मंगलाचरण, स्वागत के लिए उत्सुक भीड़, सुरक्षा का तामझाम, फोटो-खबर आदि का आनंद जब थम जाता है तो धीर से धीर और अनासक्तसे अनासक्त का अधीर हो उठना स्वाभाविक है। उसे अपने पुराने सुखदायी दिन याद आते हैं और वह सत्ता पक्ष की ऐसी हर सही-गलत घटना और नीति की बखिया उधेड़ने की टोह में चौबीसों घंटे लगा रहता है जो सत्ता में उसकी वापसी का कारण बन सके।

इस काम में मीडिया भी उसकी खूब मदद करता है क्योंकि उसे नमक का हक जो अदा करना है! आजकल मीडिया, खास तौर से कुछ टीवी चैनलों पर यही सब हो रहा है। कहने की जरूरत नहीं कि अंगरेजी चैनल यह काम कुछ ज्यादा ही कर रहे हैं।
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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