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किसान की पीड़ा

मेधा पाटकर का लेख ‘फिर क्यों छिड़ी जमीन की लड़ाई’ (जनसत्ता, 24 फरवरी) पढ़ा। जो व्यक्ति आजीवन किसानों की समस्याओं के लिए संघर्षरत रहा हो उसे किसान-विरोधी नीतियों की पहचान करने में ज्यादा समय नहीं लगता। मेधा पाटकरजी ने बहुत सटीक विश्लेषण करते हुए ‘भूमि अधिग्रहण अध्यादेश’ के सभी पहलुओं को सामने रखा है। जनता […]

Author March 2, 2015 10:10 PM

मेधा पाटकर का लेख ‘फिर क्यों छिड़ी जमीन की लड़ाई’ (जनसत्ता, 24 फरवरी) पढ़ा। जो व्यक्ति आजीवन किसानों की समस्याओं के लिए संघर्षरत रहा हो उसे किसान-विरोधी नीतियों की पहचान करने में ज्यादा समय नहीं लगता। मेधा पाटकरजी ने बहुत सटीक विश्लेषण करते हुए ‘भूमि अधिग्रहण अध्यादेश’ के सभी पहलुओं को सामने रखा है।

जनता द्वारा चुनी गई पूर्ण बहुमत की सरकार ही जनता की जमीन छीन कर या उन्हें प्रलोभन देकर ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ बनाना चाहती है। जिनमें ‘विशेष’ लोगों के लिए तो पूर्ण सुविधाएं होंगी, लेकिन किसान-मजदूर वहां ‘बाहरी’ गिने जाएंगे। दरअसल, ये ‘विशेष अधिकृत क्षेत्र’ होंगे। गांवों को ध्वस्त करके शहरीकरण और औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसमें सिर्फ कॉरपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मिलने वाली सुविधाओं का ध्यान रखा जा रहा है। आदिवासी लोग अपने जल-जंगल और जमीन के बुनियादी अधिकार से वंचित हैं। और यह सब करने वाली हमारी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार ही है।

विडंबना है कि रात-रात भर जाग कर गरमी, सर्दी, बरसात की परवाह न करते हुए जिस जमीन पर हमारे देश का किसान जो फसल उगाता है। उस फसल को कभी उधार देने वाला महाजन ले जाता है तो कभी बाजार में उचित मूल्य (न्यूनतम समर्थन मूल्य) न मिलने के कारण, तो कभी फसल बर्बाद हो जाती है। जो भी हो, नुकसान किसान का ही हुआ, उसका जीवन अभावपूर्ण ही रहा। इस सरकार से उनको भी कुछ उम्मीदें थीं, लेकिन इन्हें कहां पता था कि ये सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। बोलते कुछ और हैं करते कुछ और। अब तो आलम यह है कि उसे अपनी उस जमीन से भी हाथ धोना पड़ेगा, जो उसके परिवार का आधार थी। मेधा पाटकर की उस बात से मैं सहमत हूं कि ‘भूमि आबंटित करने से कॉरपोरेट नए जमींदार बनते गए और छोटे-मझोले किसान बनने लगे भूमिहीन। भूमिहीनों को भूमि देने के सुधार कार्यक्रम तो भूल ही गए नेता-अधिकारी।’

‘जमीन, जोतने वाले की’ जैसी बातें अब स्वप्न बन कर रह गर्इं। इसके साथ पानी का मामला भी महत्त्वपूर्ण है, जहां एक ओर विदेशी कंपनियों को शीतल पेय बनाने के लिए पानी उपलब्ध करवाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर, अपने देश के लोगों के लिए पीने का साफ पानी भी उपलब्ध नहीं है। हमारी सरकार सबसे बड़े कृषि क्षेत्र को छोड़ कर ‘इंडस्ट्रियल कॉरिडोर’ जैसी परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रही है। अण्णा हजारे के नेतृत्व में किसान आंदोलन शुरू हो चुका है, अगर सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही तो यह विरोध और अधिक बढ़ेगा। हो सकता है कि यह एक बड़े जनांदोलन का रूप ले ले, ऐसी स्थिति में उन्हें सेना और सशस्त्र बलों का प्रयोग अपने ही देश के लोगों के खिलाफ करना पड़ेगा जैसा कि हर आंदोलन को दबाने के लिए सरकारें पहले से करती आ रही हैं।
नवीन नौटियाल, जनकपुरी, नई दिल्ली

 

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