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कुछ हिंदी विरोधी हिंदी को धर्म विशेष से जोड़ कर देखते हैं। सच्चाई यह है कि किसी भी भाषा को धर्म से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। हिंदी को कभी धर्म, जाति, क्षेत्र के आधार..

Author September 24, 2015 2:04 AM

कुछ हिंदी विरोधी हिंदी को धर्म विशेष से जोड़ कर देखते हैं। सच्चाई यह है कि किसी भी भाषा को धर्म से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। हिंदी को कभी धर्म, जाति, क्षेत्र के आधार पर अनचाहे विरोध का सामना करना पड़ा है जिस कारण इसका विकास मार्ग अवरुद्ध हुआ है। इसके साथ ही उसे अंग्रेजी से भी संघर्ष करना पड़ा है। हिंदी को मलिक मुहम्मद जायसी, रहीम, रसखान, अमीर खुसरो, मुल्ला दाउद, बाबा फरीद जैसे विश्व प्रसिद्ध मुस्लिम कवियों ने अपनाया।

दूसरी ओर गुरु नानक से लेकर सभी धर्म गुरुओं ने अंगीकार किया। हिंदी का समर्थन राजा राममोहन राय, बंकिम चंद्र चटर्जी, महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर और डॉ जाकिर हुसैन जैसे अहिंदी भाषियों ने भी किया। आज सूरीनाम, त्रिनिदाड, टोबैगो, मारीशस, नेपाल, पोलैंड में हिंदी बोलने-समझने वालों की पर्याप्त संख्या है। यदि भाषा को धर्म से जोड़ कर देखा जाए तो हिंदू धर्म के अधिकतर अनुयायी संस्कृत से और मुस्लिम अरबी-फारसी से भली भांति परिचित नहीं हैं। हिंदी सभी हिंदुस्तानियों की भाषा है। किसी धर्म से जोड़ कर इसका क्षेत्र संकुचित-सीमित न करें।

सालिम मियां, एएमयू, अलीगढ़

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