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हाशिये पर मुद्दे

अगर चुनाव न हो तो हमारे सत्ताधीशों को शायद यह पता ही न रहे कि भुखमरी, बेरोजगारी, खेती-किसानी किस चिड़िया का नाम है। स्वतंत्र भारत के लगभग अड़सठ वर्षों में जहां कुदरत ने सब कुछ दिया है, वहां बहुत बड़ी आबादी गरीब क्यों है? कच्चे माल के रूप में हमारे देश में पर्याप्त खनिज, वन-संपदा, […]
Author March 19, 2015 09:00 am

अगर चुनाव न हो तो हमारे सत्ताधीशों को शायद यह पता ही न रहे कि भुखमरी, बेरोजगारी, खेती-किसानी किस चिड़िया का नाम है। स्वतंत्र भारत के लगभग अड़सठ वर्षों में जहां कुदरत ने सब कुछ दिया है, वहां बहुत बड़ी आबादी गरीब क्यों है? कच्चे माल के रूप में हमारे देश में पर्याप्त खनिज, वन-संपदा, दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ और सोना उगलती धरती हर राज्य में है। अगर इतना काफी नहीं हो तो हालत यह है कि बूढ़ी होती दुनिया में सर्वाधिक नौजवान भारतीय ही हैं। देश की आधी से ज्यादा आबादी पच्चीस वर्ष से भी कम उम्र की है। तो फिर समस्या क्या है? गरीब या गरीबी क्यों है देश में? क्या इसलिए कि सालों तक गलत आर्थिक नीतियां चलती रहीं या फिर इसलिए कि नेताओं ने एक ही राजनीतिक राज सीखा है, वह यह कि अनपढ़, गरीब लोगों का वोट लेना आसान है क्योंकि जिसे दो जून की रोटी ही बड़ी मुश्किल से मयस्सर हो रही हो, वह उससे बढ़ कर कुछ सोचेगा भी नहीं?

आज अमीर हिंदुस्तानियों का जीवन-स्तर विकसित देशों के बराबर हो चुका है। उनके बच्चों के लिए अच्छे प्राइवेट स्कूल हैं और अगर देश के किसी कॉलेज में दाखिला न मिले तो विदेश भेजना भी मुश्किल नहीं। अगर कोई बीमार हो जाए तो मुंबई-दिल्ली जैसे शहरों में इतने अच्छे अस्पताल बन चुके हैं कि आमतौर पर सभी बड़े नेताओं ने भी विदेश जाना बंद कर दिया है। बात हो बिजली की तो अगर सरकारी बिजली न मिले तो जेनरेटर से काम चल रहा है। सबसे महंगी लक्जरी गाड़ियां लगभग सभी उद्योगपतियों के पास हैं, कुछ के पास तो निजी उड़नखटोले भी। दूसरी तरफ है गरीबों का हिंदुस्तान, जहां इनके लिए सभी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, रोटी और कपड़े का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है, बिजली, पानी और शिक्षा-स्वास्थ्य आज भी गंभीर समस्याएं हैं। शहरी क्षेत्रों में जहां एक हजार सात सौ बीस लोगों पर एक डॉक्टर है, वहीं ग्रामीण भारत में चौंतीस हजार लोगों पर एक डॉक्टर है।

देश की साठ फीसद आबादी जिस कृषि पर निर्भर है, आज उसी कृषि के लगभग इकतालीस फीसद किसान दूसरे विकल्प की तलाश में हैं। ऐसे में देश की खाद्य सुरक्षा का क्या होगा? 1990 के बाद से अब तक लगभग तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है। क्या इसे स्वाभाविक मृत्यु माना जा सकता है? स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी भारत का हर दूसरा बच्चा रोज भूखा सोता है। उसे न बचपन नसीब है, न खुशियां। शायद इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि 1947 के बाद ऐसा कोई राजनेता पैदा नहीं हुआ, जिसने गांधीजी के ग्राम्य विकास से राष्ट्र विकास की परिकल्पना को पूरा करने के लिए कदम बढ़ाया हो। आज महात्मा गांधी या यों कहें कि सभी महापुरुषों को पेटेंट कराने की होड़ सभी राजनीतिक दलों में जारी है। पूरे सत्तातंत्र ने सभी मूल मुद्दों को हाशिये पर धकेल दिया है। वैश्वीकरण के पैरोकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि मजबूत बुनियाद बनाए बगैर ऊंचे मकान खड़े नहीं किए जा सकते हैं। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां याद आती हैं- ‘भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ/ आजकल दिल्ली में है, जेरे बहस ये मुद्दआ!’
धीरेंद्र गर्ग, सुल्तानपुर, उत्तरप्रदेश

 

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