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भट्ठे और कानून

हरियाणा के र्इंट भट्ठा उद्योग पर हाल ही में एक शोध के मुताबिक राज्य में पंजीकृत 3036 र्इंट भट्ठा इकाइयों में से किसी के पास भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का प्रमाणपत्र नहीं है जबकि कानूनन भट्ठा मालिक के लिए यह प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य है। कानून के अनुसार र्इंटों को पकाने के लिए कोयले का उपयोग […]

हरियाणा के र्इंट भट्ठा उद्योग पर हाल ही में एक शोध के मुताबिक राज्य में पंजीकृत 3036 र्इंट भट्ठा इकाइयों में से किसी के पास भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का प्रमाणपत्र नहीं है जबकि कानूनन भट्ठा मालिक के लिए यह प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य है। कानून के अनुसार र्इंटों को पकाने के लिए कोयले का उपयोग जाना अनिवार्य है जबकि व्यवहार में एक भी भट्ठा ऐसा नहीं पाया गया जहां जलावन के लिए सिर्फ कोयले का प्रयोग किया जा रहा हो।

असलियत में यहां जलावन के तौर पर मुख्यत: लकड़ी, भूसा, तूड़ी और प्लास्टिक-रबड़ के कचरे आदि का ही बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है जिससे प्रदूषण नियंत्रण की जगह प्रदूषण का विस्फोट हो रहा है। इससे न केवल भट्ठे की चिमनी से धुआं अधिक मात्रा में निकलता है बल्कि इस धुएं के साथ ऐसी बारीक राख भी निकलती है जो समस्त प्राणी जगत के लिए प्राणघातक और आसपास की खेती के लिए भी नुकसानदेह है।

राज्य में लगभग 200 भट्ठे बिना पंजीकरण के चल रहे हैं जिन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा रही है। साल-दर-साल प्राकृतिक संसाधन- मिट्टी- का दोहन निजी फायदे के लिए खुल कर किया जा रहा है। कानून कहता है कि र्इंट भट्ठा कृषि भूमि की बजाय गैर कृषि भूमि पर लगाया जाए। लेकिन शोध परिणाम बता रहे हैं कि राज्य के सभी र्इंट भट्ठे कृषि भूमि पर ही स्थापित हैं। एक भट्ठे के लिए पांच से छह एकड़ भूमि उपयोग में लाई जा रही है यानी राज्य में लगभग 16000 एकड़ कृषि भूमि र्इंट भट्ठों की भेंट चढ़ी हुई है। एक तरफ तो किसानों पर प्रकृति की मार है दूसरी तरफ भूमि अधिग्रहण जैसे कानून का कहर, कर्ज की मार और निरंतर छोटे होती जोतों के चलते न केवल देश में खाद्यान्न और बेरोजगारी का संकट बढ़ रहा है बल्कि किसानों और मजदूरों को भूखे मरने या आत्महत्या तक करने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

हरियाणा राज्य में यह उद्योग लगभग पंद्रह लाख आबादी की जीवन रेखा है जिसमें लगभग पचासी फीसद प्रवासी मजदूर हैं। इस उद्योग में चालीस फीसद महिला मजदूर कार्यरत हैं। पर यह बात अलग है कि आज तक इन लगभग तीन लाख महिला मजदूरों को इस उद्योग में एक मजदूर का दर्जा नहीं दिया गया है। भट्ठों पर महिलाएं सोलह से अठारह घंटे कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं और परिवार को भी संभाल रही हैं। महिलाओं का कहीं कोई भी रिकॉर्ड नहीं है! वैसे भी राज्य सरकार के किसी भी विभाग के पास इस उद्योग में कार्यरत मजदूरों का कोई लिखित रिकार्ड उपलब्ध नहीं है?

यह बात अलग है कि हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। राज्य में अकेले इस उद्योग में चार से चौदह साल की उम्र के लगभग पचास हजार बाल मजदूर आज भी कार्यरत हैं। हो सकता है, सत्यार्थीजी का ध्यान इन बाल मजदूरों की ओर भी गया हो! जाना भी चाहिए। भट्ठों पर न तो कोई स्कूल है और न बालबाड़ी की कोई व्यवस्था है। पर क्या मजाल है कि किसी भी उद्योग मालिक पर आज तक कोई कानूनी कार्रवाई हुई हो।

बड़ा अच्छा हो यदि मोदीजी देश के इन करोड़ों मजदूरों के मन की बात करें। इस गरीब, दलित, बेबस, बेघर और रोजगार विहीन करोड़ों की आबादी को नमामि गंगे की तरह सुधार के लिए बीस हजार करोड़ रुपए नहीं चाहिए। ये करोड़ों मजदूर तो बस इतना चाहते हैं कि सरकार श्रम कानूनों को व्यवहार में ईमानदारी से लागू करे और इस उद्योग के लिए अलग से एक कानून बना दिया जाए!
मुकेश कुमार, महावीर एंक्लेव, दिल्ली

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