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शोषण का श्रम

हरियाणा के र्इंट भट्ठा उद्योग में 20-25 सालों तक काम करने पर भी मजदूरों के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं है। महज कानून बना कर जिम्मेदारी की इतिश्री समझ लेना ठीक नहीं है। यहां 78 फीसद मजदूर शराब, अफीम और सुल्फा के आदि हैं जो अपनी छोटी-सी कमाई का मोटा हिस्सा नशे में […]

हरियाणा के र्इंट भट्ठा उद्योग में 20-25 सालों तक काम करने पर भी मजदूरों के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं है। महज कानून बना कर जिम्मेदारी की इतिश्री समझ लेना ठीक नहीं है। यहां 78 फीसद मजदूर शराब, अफीम और सुल्फा के आदि हैं जो अपनी छोटी-सी कमाई का मोटा हिस्सा नशे में खपा देते हैं। भट्ठों पर यह बिल्कुल संभव है कि एक समय आटा या चावल न मिले पर चौबीसों पहर दारू जरूर उधारी पर भी उपलब्ध रहती है। यहां न तो कोई चिकित्सा सुविधा है और न मजदूरों को सुरक्षा के उपकरण दिए जाते हैं।

कहने को तो इस उद्योग पर बीस केंद्रीय और चार राज्य स्तरीय श्रम कानून लागू हैं। पर बानगी के तौर पर हम देख सकते हैं कि 1923 में लागू हुए श्रम कानून के प्रावधान आज तक इस उद्योग के मजदूरों पर असल में लागू नहीं हुए हैं। असल व्यवहार में यहां एक ही कानून चलता है और वह है मालिक का लट्ठ कानून। इसके चलते भट्ठों पर मजदूर जानवरों से भी बदतर हालात में जीने को मजबूर हैं।
मुकेश कुमार, महावीर एंक्लेव, दिल्ली

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