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क्रिकेट का हश्र

पांच अप्रैल को रविवारी में प्रकाशित हरीश त्रिवेदी की दिलचस्प विवेचना ‘क्रिकेट और प्रेमचंद’ ने फिर साबित कर दिया कि प्रेमचंद कितने यथार्थवादी और दूरद्रष्टा लेखक थे। 1937 में जमाना रिसाला में प्रेमचंद की कहानी ‘क्रिकेट मैच’ प्रकाशित हुई थी जो उनका आखिरी अफसाना था। कहानी भारत-आस्ट्रेलिया के एक मैच की है। इसके केंद्र में […]

Author April 10, 2015 11:00 PM

पांच अप्रैल को रविवारी में प्रकाशित हरीश त्रिवेदी की दिलचस्प विवेचना ‘क्रिकेट और प्रेमचंद’ ने फिर साबित कर दिया कि प्रेमचंद कितने यथार्थवादी और दूरद्रष्टा लेखक थे। 1937 में जमाना रिसाला में प्रेमचंद की कहानी ‘क्रिकेट मैच’ प्रकाशित हुई थी जो उनका आखिरी अफसाना था। कहानी भारत-आस्ट्रेलिया के एक मैच की है। इसके केंद्र में कप्तान (हिज हाइनेस) भी हैं और खिलाड़ी भी।

नायिका हेलन है जो विलायत से पढ़ कर लौटी ‘मॉडर्न गर्ल’ है। कहानी मैच की खेल भावना, देशभक्तिऔर खेल के रिश्तों की चारदिवारी से निकल कर धन और हेलन (मॉडर्न गर्ल) की तरफ चक्कर काटने लगती है। क्या आज क्रिकेट का यही हश्र नहीं है? सचमुच प्रेमचंद कितने प्रासंगिक हैं कि आज की बात अस्सी साल पहले कह गए।
नंदलाल, दिल्ली विश्वविद्यालय

 

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