ताज़ा खबर
 

संकीर्णता के विरुद्ध

तीन अगस्त के अंक में ‘गाय का अर्थशास्त्र’ लेख के जरिए पहली बार गाय की उपयोगिता के संदर्भ में वैज्ञानिक तथ्य सामने आए हैं वरना अब तक यह विषय केवल हिंदुत्ववादियों के धर्माधारित तर्कों के तरकश का तीर था। जीवित गाय से प्राप्त विभिन्न खाद्य और औषधिकारी पदार्थ उसके मांस की अपेक्षा कहीं अधिक लाभकारी […]

Author August 9, 2015 4:36 PM

तीन अगस्त के अंक में ‘गाय का अर्थशास्त्र’ लेख के जरिए पहली बार गाय की उपयोगिता के संदर्भ में वैज्ञानिक तथ्य सामने आए हैं वरना अब तक यह विषय केवल हिंदुत्ववादियों के धर्माधारित तर्कों के तरकश का तीर था। जीवित गाय से प्राप्त विभिन्न खाद्य और औषधिकारी पदार्थ उसके मांस की अपेक्षा कहीं अधिक लाभकारी हैं, यह बात लेख स्पष्ट करता है और इस तरह बताता है कि गोमांस पर प्रतिबंध एक व्यावसायिक निर्णय है, न कि धार्मिक अवधारणा के पक्ष में लिया गया कोई अवैज्ञानिक निर्णय। इस स्पष्टीकरण के लिए के. विक्रम राव को बधाई दी जानी चाहिए। जाहिर है कि जब कोई तथ्य वैज्ञानिक आधार पर सामने आता है तो उसकी पक्षधरता करने वालों में जाति या धर्म का भेद कोई मायने नहीं रखता। लेख उजागर करता है कि कई लोगों ने इस वैज्ञानिक जानकारी की पुष्टि की है जो गोमांस खाने से परहेज नहीं करते। समझा जा सकता है कि गोमांस का भक्षण पूरे विश्व में वर्जित नहीं है।

इसी क्रम में यह लेख कुछ और महत्त्वपूर्ण विमर्श का प्रस्थान बिंदु बनता है। पाकिस्तान बनने की प्रक्रिया के दौरान जिन्ना ने कहा कि ‘हिंदू लोग हमसे हाथ मिला कर साबुन से हाथ धोते हैं और हमें गोमांस नहीं खाने देते’। मैं देखता हूं कि एक वर्ग की यह मानसिकता आज भी कायम है और इसके चलते देश के भीतर की शांति व्यवस्था अक्सर भंग होती रहती है जिसमें राजनीतिक घटकों का भी अपना योगदान होता है। मेरा दृष्टिकोण है कि जो लोग मांसाहारी हैं उनके लिए विभिन्न पशुओं के मांस में भेद रखना केवल एकांगी मानसिकता का प्रतीक है, ठीक उसी तरह जैसे कुछ लोग वर्ष, माह या सप्ताह के किन्हीं विशेष दिनों में दाढ़ी बनाने यहां तक कि कपड़े धोने तक को वर्जित मानते हैं, भले ही उन दिनों वे अपनी दिनचर्या के किन्हीं अनैतिक या अमानवीय कार्य कलापों से परहेज नहीं करते। न उनका झूठ बोलना रुकता है न घूस लेना या छद्म आचार।

इस अंधविश्वासपूर्ण संकीर्णता को केवल वैज्ञानिक सोच का वातावरण दूर कर सकता है। लेकिन अभी तो हाल यह है ‘देशव्यापी’ स्तर पर वैज्ञानिक सोच को विस्थापित करके शिक्षा से लेकर रचनात्मक सांस्कृतिक परिवेश में भी अंधविश्वास रोपा जा रहा है और ऐसी जड़ अवधारणाएं पुनर्जीवित हो रही हैं जो दशकों के प्रयास से विलुप्त हो चुकी थीं। के. विक्रम राव के इस लेख में मैं कहीं यह स्वर भी सुन पा रहा हूं कि इस संकीर्णता पर बहुत तेजी से अंकुश लगाया जाना चाहिए वरना हम दशकों की अर्जित की हुई वैज्ञानिक चेतना कुछ ही बरसों में खो बैठेंगे।
अशोक गुप्ता, इंदिरापुरम, गाजियाबाद

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App