ताज़ा खबर
 

आचार संहिता जरूरी

इन दिनों घरों में लोग अक्सर चिढ़ कर टीवी बंद कर देते हैं। उस दिन मैंने भी बंद किया और रात तक चालू नहीं किया। पिछले कुछ दिनों से एक फांसी को लेकर हर चैनल पर इतना घमासान मचा जितना शायद उस दिन भी नहीं मचा था जब 257 बेकसूर लोग घमाकों में मारे गए […]

Author August 4, 2015 1:44 AM

इन दिनों घरों में लोग अक्सर चिढ़ कर टीवी बंद कर देते हैं। उस दिन मैंने भी बंद किया और रात तक चालू नहीं किया। पिछले कुछ दिनों से एक फांसी को लेकर हर चैनल पर इतना घमासान मचा जितना शायद उस दिन भी नहीं मचा था जब 257 बेकसूर लोग घमाकों में मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे। एक लोकतांत्रिक देश की बुनियाद में संविधान होता है। देश का हर नागरिक कानून के दायरे में है। हमारी न्याय व्यवस्था पर धीमे काम करने का आरोप अक्सर लगता रहा है। उपर्युक्त प्रसंग में भी देखें तो मामला बाईस साल पुराना है। यह भी कहा जाता है कि कानून की तमाम गलियों के कारण कई बार अपराधी छूट भी जाते हैं।

कानून स्वयं मानता है कि चाहे सौ अपराधी छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। इस सिद्धांत और विचार की रोशनी में अपराधी को अपना बचाव करने के असीम अवसर हमारी न्याय व्यवस्था देती है। ऐसे में अगर सर्वोच्च न्यायालय अपना काम कर रहा है तो टीवी चैनलों को अनावश्यक बहसें आयोजित कर वातावरण को कलुषित करने की क्या जरूरत है?

नेता तो अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रख कर बयान देते हैं न कि सत्य, देश और नैतिकता के आधार पर बोलते हैं। जनता इस बात को समझती भी है और उनके बयानों की प्राय: खिल्ली उड़ाती है। पर अफसोस कि टीवी चैनल इनसे अपनी रोटी या जिसे ये लोग कहते हैं ‘टीआरपी’ सेंकते हैं। उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि टीआरपी से अंतत: कौन जुड़ा हुआ है। टीवी के उनके दर्शक ही टीआरपी हैं। दर्शक मासूम ही सही, पर टीवी के अन्नदाता हैं।

खबरिया टीवी चैनलों को इस बात का खयाल रखना चाहिए कि खबरों को मिर्च-मसाला लगा कर इस तरह प्रस्तुत न करें जिससे किसी को भड़कने या भड़काने का मौका मिल जाए। जनता बड़े प्रयासों और धैर्य से सामाजिक सौहार्द का सृजन करती है। जरा-सी चूक उसके किए-कराए को नष्ट कर सकती है। यही नहीं, इसे वापस पटरी पर लाने के लिए हमारी अनेक संस्थाओं और सुरक्षा बलों को अपनी ताकत झोंकनी पड़ती है। जान-माल का नुकसान होता है सो अलग। यह बात और है कि स्थिति बिगड़ने पर खबरों के बाजार में नया बिकाऊ माल आ जाता है। लेकिन चैनलों को क्षुद्र व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा से बचना चाहिए।

सरकार का भी दायित्व बनता है कि टीवी चैनलों के लिए आचार संहिता का सख्ती से पालन करवाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर खुली छूट नहीं मिल जाना चाहिए। आखिर देश में फिल्मों के लिए भी सेंसर बोर्ड है, नियम-कायदे हैं तो टीवी चैनल ‘नंदी’ बने खुले कैसे घूम सकते हैं! दंगों के समय दंगा-लाइव, धमाकों के समय घमाका-लाइव, द्वेष फैलाने वालों के साथ उकसाती बहसें-लाइव! पश्चिम वालों ने इसे ‘इडियट बॉक्स’ कहा लेकिन हमारे यहां यह ‘अग्ली-बाक्स’ है!
जवाहर चौधरी, कौशल्यापुरी, इंदौर

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App