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नवाचार की दरकार

हाल ही में शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत ‘प्रथम’ नामक एक स्वयंसेवी संगठन ने शौक्षिक स्थिति पर वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। ‘असर’ नामक इस रिपोर्ट में इस बार 596 जिलों के 5.46 लाख बच्चों को अपने सर्वेक्षण में शामिल किया है जो पिछले वर्षों की तुलना में कहीं ज्यादा है।

Author February 4, 2019 3:41 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (प्रतीकात्मक तस्वीर/PTI)

हाल ही में शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत ‘प्रथम’ नामक एक स्वयंसेवी संगठन ने शौक्षिक स्थिति पर वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। ‘असर’ नामक इस रिपोर्ट में इस बार 596 जिलों के 5.46 लाख बच्चों को अपने सर्वेक्षण में शामिल किया है जो पिछले वर्षों की तुलना में कहीं ज्यादा है। इस वर्ष की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा के अधिकार को लागू करने के बाद भारत में शिक्षा की गुणवत्ता में पहली बार सुधार हुआ है, जो इस रिपोर्ट के आंशिक रूप से आंकड़ों में हुए सकारात्मक बदलाव से स्पष्ट होता है। आंकड़ों पर गौर करें तो पाते हैं कि 2012 में कक्षा पांच के 46.9 फीसद विद्यार्थी कक्षा दो की पाठ्यपुस्तक पढ़ सकते थे, उनका प्रतिशत बढ़कर 2018 में 50.5 हो गया। लेकिन इसे सापेक्षिक सुधार करते हैं न कि अपेक्षित सुधार।

शिक्षा की इस बदहाली का परिणाम है कि कुछ नामचीन राज्यों की बोर्ड परीक्षाओं में वरीयता प्राप्त विद्यार्थियों के बारे में खुलासा होता है कि उन्हें अपनी कक्षा के सामान्य प्रश्नों के जवाब भी नहीं मालूम। लेकिन उस समय ठीकरा फोड़ते हैं पेपर चोरी या लीक कराने वाले गिरोह पर; साथ ही चंद पैसों में अपने राज्य का भविष्य बेचने वाले शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर, जिनकी मिलीभगत से यह कुकृत्य संपन्न होता है। नेपथ्य में जाने पर पता लगता है कि इनकी शैक्षणिक नींव ही इतनी मजबूत नहीं है कि अपने बूते शीर्ष स्थान प्राप्त कर सकें। ऐसी रिपोर्ट्स के जरिए बेबाक तौर पर कह सकते हैं कि केवल कानून बना कर या योजनाओं को लागू कर देने मात्र से अपेक्षित सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती; शिक्षा में नवाचारी तरीकों को अपनाना ही होगा। साथ ही प्रभावी शोध और अनुसंधान को प्राथमिकता देनी होगी। बाजारीकरण का दंश झेल रही वर्तमान शिक्षा प्रणाली के गिरते स्तर के कारण गुणवत्ता पर प्रश्न उठना लाजमी है लेकिन इस मुद्दे पर बहस करने को जिम्मेदार लोग तैयार ही नहीं हैं।

छियासीवें संविधान संशोधन के जरिए छह से चौदह वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा देना एक बेहतर कदम था, क्योंकि प्राथमिक शिक्षा एक अनिवार्य मूलभूत अधिकार है। इसके अंतर्गत सर्वशिक्षा अभियान चलाया गया जिसकी आशानुरूप सफलता विद्यालयों में केवल नामांकन बढ़ने तक सीमित रही। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में कोई भी सरकारी प्रयास कारगर साबित नहीं हो पाए हैं। विभिन्न राज्य सरकारों व केंद्र सरकार सहित अनेक संस्थानों द्वारा विद्यार्थियों के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इस साल नववर्ष के मौके पर छात्रों में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की पहल करते हुए इसरो ने विद्यार्थियों के साथ संवाद कार्यक्रम शुरू किया। यह कदम सराहनीय है लेकिन ऐसे ही नवाचारी कदम हमें प्रारंभिक शिक्षा में सुधार के लिए उठाने होंगे ताकि नींव को मजबूत किया जा सके।
’चिमन भवानी सिंह, बाड़मेर, राजस्थान

शैक्षिक बुनियाद
देश में शिक्षा का अधिकार कानून और सर्वशिक्षा अभियान जैसी योजनाएं लागू होने के बाद भी प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधरी है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश भर में आठवीं कक्षा के 28 फीसद छात्र ऐसे हैं जो कक्षा दो का पाठ तक नहीं पढ़ पाते हैं। देश में बेटियों की पढ़ाई को लेकर जागरूकता बढ़ी है, पर मध्यप्रदेश में स्कूल न जाने वाली लड़कियों की तादाद में वृद्धि हुई है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार देश में आधे से अधिक बच्चे गणित विषय में बेहद कमजोर हैं। चार में से एक बच्चा एक वाक्य तक नहीं पढ़ सकता। चौंकाने वाली बात यह है कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के आठ साल बाद भी सरकारी स्कूलों में पेशेवर शिक्षकों की भारी कमी है। नतीजतन, आज प्राथमिक शिक्षा भयंकर अव्यवस्था की शिकार है। जरूरत इस बात की है कि प्राथमिक शिक्षा को सशक्त बनाया जाए ताकि बच्चों की शैक्षिक बुनियाद मजबूत हो सके।
’चांद मोहम्मद, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली

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