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सेहत की सवारी

आपके समाचार पत्र में 24 जनवरी को ‘साइकिल की सवारी’ लेख छपा। यह बहुत ही सार्थक लेख है। भारत के मध्य और उच्च वर्ग में बीते जमाने की सवारी समझी जाने वाली साइकिल को अब भारत में निकृष्ट दृष्टि से देखने की एक आदत सी बन गई है, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों से अब यह सिद्ध हो चुका है कि प्रतिदिन अपने सामान्य काम साइकिल से करने वाले लोग मोटरसाइकिल, स्कूटर या कारों का प्रयोग करने वालों से हर तरह से स्वस्थ और लंबा जीवन जीने वाले होते हैं।

Author February 11, 2019 3:45 AM
प्रतीकात्मक फोटो (सोर्स- एजंसी)

आपके समाचार पत्र में 24 जनवरी को ‘साइकिल की सवारी’ लेख छपा। यह बहुत ही सार्थक लेख है। भारत के मध्य और उच्च वर्ग में बीते जमाने की सवारी समझी जाने वाली साइकिल को अब भारत में निकृष्ट दृष्टि से देखने की एक आदत सी बन गई है, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों से अब यह सिद्ध हो चुका है कि प्रतिदिन अपने सामान्य काम साइकिल से करने वाले लोग मोटरसाइकिल, स्कूटर या कारों का प्रयोग करने वालों से हर तरह से स्वस्थ और लंबा जीवन जीने वाले होते हैं। यूरोप के कई देशों के लोग और एशिया में चीन के लोग अपने-अपने देश में पर्यावरण, प्रकृति और अपने स्वास्थ्य के प्रति हम भारतीयों से ज्यादा सचेत और जागरूक हैं। वे अपना दैनिक और सामान्य काम जैसे बाजार और दफ्तर भी जाने का काम बिना संकोच के करते हैं। उनके बच्चे अक्सर स्कूल-कॉलेज जाने में भी साइकिल का ही प्रयोग करते हैं। वैज्ञानिक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि साइकिल चलाने से साल भर में पांच किलो तक वजन कम करके बहुत सी बीमारियों से बचा जा सकता है। शहरों में साइकिलों का प्रयोग बढ़ने से काफी हद तक प्रदूषण से भी मुक्ति मिल सकती है। प्रदूषण से होने वाले रोगों से भी छुटकारा मिलता है। हमें अपने देशहित में साइकिल का प्रयोग अधिकाधिक करना चाहिए।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

महिला सशक्तिकरण
हर ओर महिला सशक्तिकरण की बात तो हो रही है, लेकिन क्या वाकई महिलाएं सशक्त हुई हैं, यह कहना मुश्किल है। समाचार पत्र हों या टीवी चैनल सभी बलात्कार, दहेज और भ्रूण हत्या की घटनाओं से भरे मिलते हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि इन आंकड़ों में दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है। महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा और शोषण की घटनाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। तमाम झंझावतों को पार करते हुए भी महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने का प्रयास कर रही हैं। कई क्षेत्रों में महिलाएं पुरुषों से आगे हंै, लेकिन बहुत से क्षेत्र ऐसे हैं जहां पुरुष प्रधान मानसिकता वाले लोग हैं, वहां महिलाओं को संघर्ष करना पड़ रहा है। इसी मानसिकता की वजह से हमारा देश बाकी देशों से पीछे है। अगर देश को आगे बढ़ाना है तो महिलाओं को साथ लेकर चलना बहुत जरूरी है। स्त्री और पुरुष गाड़ी के दो पहिए हैं। अगर कोई एक पहिया भी खराब हो गया तो गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। हमें अपनी हर बेटी को इतना सशक्त बनाना है कि उनके आगे आने वाली हर चुनौती को वो पार सकें। तभी सही मायने में महिला सशक्तीकरण हो पाएगा।
’मोहम्मद अनस, दिल्ली विवि

खस्ताहाल पटरियां
रोजाना लाखों लोग अपनी यात्रा के लिए रेलगाड़ी पर निर्भर हैं। इसलिए 2019 के बजट में रेलगाड़ियों के लिए अच्छा खासा बजट तैयार किया गया है। बजट के साथ यह दावा भी किया गया कि ज्यादातर रेल लाइनों का सुधार कार्य पूरा हो चुका है और इनका तेजी से विस्तार भी हो रहा है। लेकिन तीन फरवरी को हुआ सीमांचल एक्सप्रेस का रेल हादसा इस वादे की असलियत को बयां करता दिख रहा है। यह बीते दस महीनों में हुआ पाचवां बड़ा हादसा है, जिसमें आर्थिक नुकसान के साथ-साथ लोगों को अपनी जाने भी गंवानी पड़ीं। पिछले चार सालों में रेल दुर्घटना की संख्या सबसे ज्यादा रही है। ज्यादातर हादसों का कारण रेल पटरियों की खस्ता हालत को बताया जा रहा है। यह बात तो साफ है कि वादों और बातों से इन पटरियों को ठीक नहीं किया जा सकता। सरकार जल्द से जल्द रेल पटरियों की खस्ता हालत को दुरुस्त करवाए। साथ ही ऐसे कर्मचारियों को सजा भी दी जाए जो अपने काम को जिम्मेदारी के साथ करना नहीं जानते।
’निशांत रावत, दिल्ली विवि

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