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बेचारे नरेंद्र भाई

आदरणीय नरेंद्र भाई, तवलीन (सिंह) बेन का 14 दिसंबर के जनसत्ता में छपा लेख, ‘विकास के बजाय’ पढ़ कर गला भर आया। कहां आप विदेशों में जाकर देश को विकास की तरफ ले जाने में जुटे हुए हैं, और कहां आपके संघ पाठशाला के सहपाठी देश को किसी सुनहरे भूत की तरफ लिए जा रहे […]
Author December 23, 2014 13:53 pm

आदरणीय नरेंद्र भाई, तवलीन (सिंह) बेन का 14 दिसंबर के जनसत्ता में छपा लेख, ‘विकास के बजाय’ पढ़ कर गला भर आया। कहां आप विदेशों में जाकर देश को विकास की तरफ ले जाने में जुटे हुए हैं, और कहां आपके संघ पाठशाला के सहपाठी देश को किसी सुनहरे भूत की तरफ लिए जा रहे हैं। आप गुजराती में मोटे भाई और हिंदी में बड़े भाई हैं। जाहिर है, परिवार के मुखिया हैं आप, और आप ही को हिंदू परंपरा के अनुसार घर के भेदियों और रिश्तेदारों ने बेबस बना दिया है। इसी बात से परेशान हैं तवलीन बहन। वे नहीं जानतीं कि सोशल पार्टियों में मिलने वाले या दूसरी पार्टियों वाले अपने मित्रों को इस बात का क्या जवाब दें कि छप्पन इंची छाती वाले मोटे भाई अपने परिवार वालों को रोक क्यों नहीं पा रहे हैं?

अब देखिए, जब आम चुनाव के दौरान आप अपनी कड़कती हुई आवाज और ‘सुसभ्य’ भाषा में ‘परिवर्तन’ और ‘विकास’ के नारे लगा रहे थे, उस समय तवलीन बेन को कैसे अंदाजा हो सकता था कि आपके परिवार वाले आपकी ही छत्रछाया में अपने ‘शुद्ध’ एजेंडों को लेकर आपकी जीत के लिए जी-जान से लगे हुए थे (जी अपना, जान पराई)। तवलीनजी के शब्दों में, ‘न हिंदुत्व का कोई मुद्दा था… न ही राम मंदिर का कोई जिक्र’। ‘मुख्य मुद्दा थे मोदी खुद’। चुनाव अभियान की गहमा-गहमी में अगर मुद्दे के खुद अपने मुंह से ‘पचास हजार की गर्लफ्रेंड’ या ‘गाड़ी के पहिये के नीचे आए हुए पिल्लों’ के जैसे कुछ जुमले निकले भी थे तो मजाक में। चुनाव के दौरान ही जिस खूबी से आपने उस समस्या का हल सुझाया जिससे पूरी दुनिया दूसरे महायुद्ध के बाद जूझती रही है- शरणार्थियों के मानवाधिकारों की समस्या- उससे शायद तवलीन बेन के मन में आप के ‘परिवर्तन’ के एजेंडे पर विश्वास और भी बढ़ गया होगा। असम और बंगाल में सार्वजनिक मंच से बोलते हुए बांग्लादेशी शरणार्थियों की समस्या पर आपने दूध का दूध और पानी का पानी करते हुए कहा था कि… ये मानवता या मानव अधिकारों का मामला है ही नहीं; सिर्फ मजहब का मामला है। हिंदुओं को शरणार्थी माना जाएगा और मुसलमानों को घुसपैठिया। …अब ऐसी मासूम बात में भी कम्बख्त सेक्युलरिस्ट्स को ‘हिंदुत्व’ नजर आए, तो खोट उनकी नजर में ही हुआ न! इस मासूमियत से भरे लेख को पढ़ कर, (बकौल फैज अहमद फैज) ‘गुनहगार नजर को हिजाब आता है!’

चुनाव के दौरान, जब आपके वफादार अमित शाह और भक्त गिरिराज सिंह ने ऐसे बयान दिए जिन्हें दोहराने में भी घिन आती है, तब शायद तवलीन बेन समझीं होंगी कि उन पर आपका कोई बस नहीं है और जैसे ही आप प्रधानमंत्री बनेंगे, इन जैसे लोगों को बेदखल कर देंगे। मगर ऐसे सभी वफादारों को प्रधानमंत्रीजी ने मसनद पर बैठा दिया! जब आपने शिक्षा और देश के इतिहास को एक अल्प-शिक्षित शिक्षा मंत्री के हवाले किया और उन्होंने सब कुछ दीनानाथ बतरा और संघ के हवाले किया- और बहुत-से उपकुलपतियों और आइआइटी के निदेशकों ने संघ के भागवतजी के चरणों में बैठ कर उच्च-शिक्षा के सबक सीखे, तब भी शायद बेन ने सोचा होगा कि यह विकास और परिवर्तन का कोई ऐसा पहलू है जिससे वे अपनी पैनी नजर के बावजूद वाकिफ नहीं हैं।

तवलीनजी को आपकी निजी छवि को लेकर बहुत चिंता है। संघ के सांसद आदित्यनाथ की देखरेख में चल रही ‘घर वापसी’ की मुहिम के सिलसिले में वे कहती हैं, ‘…इन हिंदू कट्टरपंथियों ने उनका नुकसान तो किया ही है जिन्हें झूठे वादे करके ‘घर वापस’ लाना चाह रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान किया है इन्होंने नरेंद्र मोदीजी की निजी छवि का। अभी बन ही रहे थे अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक इज्जतदार राजनेता के उनके चेहरे पर दाग लग गया है’। यह बात तो तवलीनजी ने गलत कह दी। उनकी राय में नरेंद्र भाई, आप जैसे चौकस, ताकतवर और ‘इज्जतदार राजनेता’ की सहमति और आशीर्वाद के बिना ही परिंदे पर मार रहे हैं! एक जगह और तवलीन बेन ने आपकी समझदारी और ताकत पर शक किया है। ‘… मोदी जैसे ताकतवर प्रधानमंत्री को हर दूसरे दिन कोई न कोई ‘मामूली’ सांसद चुनौती दे रहा है। साध्वी का ‘‘रामजादे, हरामजादे’’ वाला बयान कानों में गूंजना बंद हुआ तो उसके बंधु साक्षी महाराज ने नाथूराम गोडसे की प्रशंसा कर डाली’। नरेंद्र भाई, मेहरबानी करके तवलीन बेन और उनके जैसे अपने अनुयाइयों और भक्तों को समझाइए कि आप कितने सच्चे और वफादार सज्जन हैं…संघ की शाखाओं में, प्रचारक के रूप में, गुजरात 2002 वाले हिंदू-हृदय सम्राट के रूप में, लिए गए प्रणों को लेकर आपकी जो जिम्मेदारी बनती है उसे आप पूरी तरह पहचानते और बरतते हैं। ‘अच्छे दिनों’ का वादा परिवार वालों के लिए था और उन्हीं को आपने अपनी टीम में शामिल किया है। अब लोग उसे गलत समझ बैठे तो आप की क्या गलती?

नरेंद्र भाई! तवलीनजी को वे तरीके सिखाइए जिनसे वे आपके जैसे अपने मित्रों को मुंह-तोड़ जवाब दे सकें। कम से कम अपना वह अंदाज तो उन तक पहुंचा ही दीजिए जो आपने एक इंटरव्यू में अपनाया था: जब आपसे गुजरात में ईसाइयों पर ढहाए गए जुल्मों के तथ्यों को लेकर सवाल पूछा गया तो आपने जाहिर किया कि उस बारे में आपको कोई जानकारी नहीं है! और वह नुस्खा भी उन तक पहुंचा दीजिए कि हिंदुस्तान भर में ‘लव जिहाद’, ‘घर वापसी’ और दिल्ली में चुनाव के नजदीक त्रिलोकपुरी, बवाना और दिलशाद गार्डन में आपके परिवार वाले जो हलचलें मचा रहे हैं, उनके बारे में आपकी तरह चुप्पी साधें।

सबसे अच्छा यह रहेगा कि आप तवलीनजी को सलाह दें कि वे संघ परिवार के गोलवलकर, सावरकर, हेडगेवर जैसे दिग्गजों के विचारों को पढ़ें और आप के आदर्शों को समझें। हिटलर का ‘मेन काम्फ’ पढ़ें और थोड़े ही समय में ‘विकास’ और ‘परिवर्तन’ लाने के आपके तरीकों को समझें।

’अशोक लाल, दिल्ली

 

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