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अण्णा से उम्मीद

सुनो अण्णा और हो सके तो गुनो अण्णा। समाचार पत्रों के अनुसार आपने रालेगणसिद्धि में पत्रकारों और टीवी चैनलों से बातचीत के दौरान मोदी सरकार के कामकाज से असंतोष जताते हुए कहा कि सशक्त लोकपाल बनाने, भष्टाचार मिटाने, विदेश से काला धन लाकर सभी के खातों में पंद्रह लाख रुपए जमा कराने और किसानों के […]

सुनो अण्णा और हो सके तो गुनो अण्णा। समाचार पत्रों के अनुसार आपने रालेगणसिद्धि में पत्रकारों और टीवी चैनलों से बातचीत के दौरान मोदी सरकार के कामकाज से असंतोष जताते हुए कहा कि सशक्त लोकपाल बनाने, भष्टाचार मिटाने, विदेश से काला धन लाकर सभी के खातों में पंद्रह लाख रुपए जमा कराने और किसानों के हित में कानून बनाने को लेकर सरकार गंभीर नजर नहीं आती। इसलिए फिर से आंदोलन करना होगा। आपकी बात सौ-फीसद सही है। इन बातों से सरकार में बैठे लोग, भारतीय जनता पार्टी के सदस्य और कारपोरेट जगत को छोड़कर देश के अधिकतर लोग सहमत होंगे। यहां तक कि कांग्रेस सहित जो भी आज सत्ता में नहीं हैं और जिनके खिलाफ आपने आंदोलन किया था वे सब आपकी बातों से न केवल सहमत होंगे बल्कि आपको हर तरह से सहयोग प्रदान करेंगे। संभव हुआ तो पिछली बार की तरह इस बार ‘ये’ आपके आंदोलन का मंच भी लूटने की जुगत में रहेंगे। तब इस पूरे करतब में एक बार फिर यदि कोई ठगा जाएगा तो वह है जनता।

फिर से आंदोलन छेड़ने के पहले पिछले आंदोलन का सबक और विश्लेषण उपयोगी हो सकता है। आपके पिछले आंदोलन के समय कई दलों पर निर्भर होने के कारण उनसे ब्लैकमेल होने वाली एक कमजोर सरकार थी जिसे मामूली धक्के से हिलाया जा सकता था। मनरेगा सरीखे गरीब-हितैषी कानूनों, वन अधिकार नियम, शिक्षा के अधिकार का कानून आदि जनोन्मुखी प्रावधानों के कारण कारपोरेट जगत और समाजवाद से नफरत करने वाला अभिजात तबका तत्कालीन सरकार से नाराज चल रहा था। साथ ही इन जनोन्मुखी कानूनों को लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति उन कानूनों को बनाने वाली सरकार में नहीं थी जिसके कारण सरकार के पक्ष में जन सामान्य के खड़े होने का सवाल ही नहीं था। आपके आंदोलन के पहले कुछ बड़े घोटाले उजागर हो गए थे। सरकार लंबे समय से चारों तरफ के आक्रमण झेलते हुए लगातार बचाव की मुद्रा में थी। इन परिस्थितियों में अरविंद केजरीवाल की दिल्ली में सूचना के अधिकार के लिए किए गए लंबे समय तक जमीनी काम की पूंजी, किरण बेदी की तेज तर्रार और कर्मठ अफसर और समाज सेवा की पूंजी, आरएसएस का समर्थन, योग गुरु रामदेव, भाजपा और सत्ता के बाहर अन्य राजनीतिक दलों का समर्थन आपके साथ था। इन सबके साथ आपसे कहीं ज्यादा वह लड़ाई मीडिया ने लड़ी। इन सब परिस्थितियों और संयोग के पंचमेल से आंदोलन को निरंतर हवा मिलती रही जिसमें कोई बुराई नहीं थी, बल्कि अच्छा ही था। माहौल ऐसा था कि यह सरकार धोखा है, धक्का मारो मौका है!

थोड़ा हिसाब-किताब आज के सूरते हाल का भी कर लिया जाए। अव्वल तो आंदोलन के पहले जितनी बदनामी उस सरकार की हो चुकी थी उसकी तुलना में यह ज्यादा जनविरोधी होने के बावजूद उतनी बदनामी से फिलहाल बची हुई है। यह पूंजीपतियों की हितैषी सरकार है इसलिए कारपोरेट स्वामित्व वाला मीडिया इसके खिलाफ किसी आंदोलन को कितना समर्थन देगा? भीड़ खींचू बाबा रामदेव अब आपके साथ क्यों आएंगे? क्या किरण बेदी अब इस आंदोलन को कुचलने की भूमिका में नहीं होंगी? अरविंद केजरीवाल से आप कितना परहेज करेंगे? परहेज करें या न करें, अरविंद की काठ की हांडी दोबारा आग पर चढ़ सकती है क्या? आरएसएस और संघ परिवार के आनुषंगिक अनेक संगठन उनकी अपनी सरकार के खिलाफ किसी आंदोलन को समर्थन भला क्यों देंगे? मजबूत, निरंकुश, तानाशाह और उदारता से दूर रहने वाली सरकार एक सीमा के बाद आंदोलन को क्यों नहीं कुचलेगी? भाजपा ने तो मोदी के साथ चलने के लिए आपकी फोटो पर माला चढ़ा दी है और बाकायदा विज्ञापित भी कर दिया है। जो आपको जिंदा ही नहीं मान रहे इस बार मुकाबला उनसे है।

यह सब जानते हैं कि व्यक्ति केंद्रित आंदोलन बहुत दूर तक नहीं जा सकता। आपको सामान्य सिपाही (जो आप फौज में थे भी) की तरह आंदोलन चलाना होगा। यह स्वीकार करना मुश्किल तो है पर यदि आप खुद को विनम्र गांधीवादी मानते हों तो मुश्किल क्यों होनी चाहिए?

श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल

 

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