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दुर्दशा की खेती

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट में माना गया है कि उर्वरकों- नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश का अनुपात, जो क्रमश: चार-दो-एक है वह एक आदर्श अनुपात नहीं है। संपूर्ण भारत में इस अनुपात का प्रयोग नहीं किया जा सकता। पंजाब में जहां इसकाअनुपात इक्कीस-छह-एक है, वहीं हरियाणा में सोलह-छह-एक है। जबकि यहां यह अनुपात चार-1.6-एक होना […]

Author July 27, 2015 1:49 PM

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट में माना गया है कि उर्वरकों- नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश का अनुपात, जो क्रमश: चार-दो-एक है वह एक आदर्श अनुपात नहीं है। संपूर्ण भारत में इस अनुपात का प्रयोग नहीं किया जा सकता। पंजाब में जहां इसकाअनुपात इक्कीस-छह-एक है, वहीं हरियाणा में सोलह-छह-एक है। जबकि यहां यह अनुपात चार-1.6-एक होना चाहिए। जिस प्रकार कृषि का क्षेत्रफल प्रत्येक राज्य में भिन्न है उसी प्रकार मृदा में पोषक तत्त्वों की मात्रा और जरूरत भी भिन्न है। आवश्यकता है मृदा की जरूरत के अनुसार उसमें उर्वरकों का प्रयोग किया जाए। सामान्यत: देखा गया है कि जागरूकता की कमी और यूरिया जैसे उर्वरक पर उपलब्ध सबसिडी ने खेतों में उर्वरकों के अनुचित अनुपात को बढ़ावा दिया है।

चूंकि कृषि राज्य सूची का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई सभी कृषिगत योजनाओं का क्रियान्वयन और उनमें परिवर्तन भी राज्य सरकार पर निर्भर करता है। हाल ही में प्रस्तुत मृदा स्वास्थ्य कार्ड रूपी केंद्र सरकार की आदर्श योजना की सफलता भी राज्य सरकार पर ही निर्भर है। अगर इस दिशा में उचित प्रयास किए जाते हैं तो वैज्ञानिक मानते हैं कि मात्र उर्वरकों के उचित उपयोग से उत्पादकता में दस फीसद तक की बढ़त देखने को मिल सकती है। जो न केवल किसान की आर्थिक समस्या को दूर करेगा, बल्कि विश्व की खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करने में भी एक अहम भूमिका निभाएगा। इस दिशा में राज्य और केंद्र सरकार को राजनीति के मंच से अलग हट कर किसान-हित में एक साथ आगे आना चाहिए।

आवश्यकता है कि ‘सहभागी संघवाद’ की संकल्पना मात्र संविधान में लिखित रूप में न रहे, बल्कि उसको धरातल पर भी उतारा जाए। हालांकि हाल ही में नीति आयोग की बैठक में जिस तरह ‘भूमि विधेयक’ पर हुई चर्चा में उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी अनुपस्थिति दर्ज कराई है वह सहभागी संघवाद और समूह भारत की संकल्पना को तोड़ने का ही प्रयास है। सामाजिक-आर्थिक जनगणना के आंकड़ों ने साफ-साफ किसानों और ग्रामीण गरीबों की छवि को प्रदर्शित कर दिया है। इसमें यह ध्यान देना होगा कि यांत्रिक खेती को बढ़ावा दिया जाए, जिससे किसानों की लागत कम आए।

देखा गया है कि या तो किसान उनको मिलने वाली सुविधाओं के प्रति जागरूक नहीं होते या विभागीय भ्रष्टाचार उन किसानों को उचित रूप से लाभान्वित भी नहीं करता। इस दिशा में राज्य सरकारों द्वारा कृषि यंत्रों पर उपलब्ध कराई जा रही सबसिडी को ‘एक मिशन’ के रूप में प्रत्येक किसान तक पहुंचाया जाए। और महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में ‘विपणन व्यवस्था’ को भी बेहतर बनाने की आवश्यकता है।
सत्य देव आर्य, मेरठ

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