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दो सवाल

योगेंद्र यादवजी, आम आदमी पार्टी (आप) में आपने ‘स्वराज’ और ‘लोकतंत्र’ का मुद्दा उठाया इसके लिए प्रशांत भूषण, अजित झा और प्रोफेसर आनंद कुमार सहित इसकी कीमत भी चुकाई। आपने कहा कि पार्टी और देश में स्वराज मॉडल लागू हो। यह सबसे अहम मुद्दा है। इसके बाद, जिस तरह से सारे घटनाक्रम चल रहे हैं […]

Author April 4, 2015 11:05 PM

योगेंद्र यादवजी, आम आदमी पार्टी (आप) में आपने ‘स्वराज’ और ‘लोकतंत्र’ का मुद्दा उठाया इसके लिए प्रशांत भूषण, अजित झा और प्रोफेसर आनंद कुमार सहित इसकी कीमत भी चुकाई। आपने कहा कि पार्टी और देश में स्वराज मॉडल लागू हो। यह सबसे अहम मुद्दा है। इसके बाद, जिस तरह से सारे घटनाक्रम चल रहे हैं और जो अंदरूनी खबरें हैं, उनके अनुसार आप शीघ्र ही एक नई पार्टी बनाने जा रहे हैं। नई पार्टी में आप इसे कैसे सुनिश्चित करेंगे- इस बारे में मेरे दो सवाल हैं। पहला, आपने ‘आप’ में शुरुआत से सामूहिक नेतृत्व की बजाए नेता और महानायक वाली छवि को क्यों अपनाया; या कहें बढ़ावा दिया? आप आगे इस प्रक्रिया को कैसे सुधारेंगे?

अरविंद केजरीवाल को भ्रष्ट्राचार के खिलाफ स्वच्छ राजनीति का महानायक बनाने में आपकी सहमति या सही कहें तो, सक्रिय सहयोग था। आप पार्टी के नीति-निर्धारक थे। 1980 से समाजवादी चिंतक, लोहिया के सहयोगी पूर्व सांसद, दिवगंत किशन पटनायक के वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग से जुड़े रहने के बावजूद आपने ग्राह्यता और दृश्यता को विचारों से ऊपर तरजीह दी। यहां तक कहा कि ‘आप’ सिद्धांतवादी नहीं, व्यवहारवादी राजनीतिक दृष्टिकोण में विश्वास रखने वाली पार्टी है। आपने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख के जरिए यह भी स्वीकारा था कि आपके राजनीतिक गुरु किशन पटनायक के सजप के प्रयोग में सिद्धांत तो थे, लेकिन वह ग्राह्यता और दृश्यता नहीं जो ‘आप’ में है! और इसके लिए आपने अरविंद केजरीवाल को महानायक की छवि दिए जाने का कोई विरोध नहीं किया क्योंकि आप जानते थे कि विचारों की बजाए महानायक को जनता तक ले जाना आसान होता है।

दूसरा, जिस स्वराज मॉडल की आप बात कर रहे हैं, उसे विचारधारा को अपनाए बिना कैसे लागू किया जा सकता है? क्या आप अपनी अगली पार्टी विचारधारा के आधार पर बनाएंगे? गांधी के स्वराज का मॉडल व्यवहारवाद के इस सिद्धांत से नहीं पाया जा सकता। उसके मूल में तो गांधी की विचारधारा छुपी है। इसमें साध्य से ज्यादा साधन का महत्त्व है।

वहीं, आपने ‘आप’ की वेबसाइट पर अपनी विचारधारा के बारे में कहा था, ‘हम विचारधारा प्रेरित न होकर समाधान केंद्रित हैं। राजनीतिक पार्टी को विचारधारा के खाके में बांधने की पुरानी परंपरा है जिसके चलते, सब मुद््दों और उसके समाधान से भटक जाते हैं। हमारा लक्ष्य समाधान केंद्रित है। अगर हमें समस्या का हल लेफ्ट (विचारधारा) से मिलेगा तो हम उस पर विचार करेंगे। उसी तरह, अगर हमें समस्या का हल राइट (या सेंटर) में मिलेगा तो हम उस पर विचार करेंगे। विचारधारा पर उपदेश देना, तो राजनीतिक पंडितों और मीडिया का काम है।’

अमेरिका का भी ‘डेमोक्रेसी’ के बारे में जो सोच है उसमें ईमानदारी, पारदर्शिता, जवाबदेही, स्वराज, जो जनता को आकर्षित करते हैं- वह सब होता है, बस विचार नहीं होते। अमेरिका जानता है कि जनता का सोचना सत्ता और कारपोरेट के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक होता है; जनता ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ की चिंता से बाहर नहीं आनी चाहिए। इसलिए वहां एक कंपनी का सीइओ बड़े आराम से देश का राष्ट्रपति बन जाता है जिसकी हम अपने देश में कल्पना नहीं कर सकते। हमारे देश में वह चुनाव जिताने या हराने में जरूर अपनी भूमिका निभा सकता है। अपने इस सोच को अमेरिका पूरी दुनिया में अपनी विभिन्न दानदाता संस्थाओं के जरिए फैलाता है, जिममें प्रमुख है- नेशनल एंडाउमेंट फॉर डेमोक्रेसी। और इस राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में, आपने भी उसी तर्ज पर एक विचारहीन क्रांति की परिकल्पना रखी; एक ऐसा माहौल बना जैसे वैचारिक बदलाव के दिन लद गए जबकि आप तो जानते थे कि उथल-पुथल के दौर में वैचारिक आधार की ज्यादा जरूरत होती है। वैचारिक आधार मिलने पर ही जनता की ऊर्जा से कुछ बुनियादी बदलाव आ पाते हैं वरना वह खतरनाक रूप ले सकती है।

इन सवालों के जवाब पूरी से ईमानदारी से ढूंढ़ें। उसी में सही रास्ता मिलेगा। यह एक ऐतिहासिक समय है जब सब लोग मिल कर अपनी दशकों की मेहनत, अनुभव और विचारधारा में विश्वास को डगमगाए बिना, एक व्यापक देशव्यापी बहस चलाएं उससे से घबराएं या बचें नहीं। इस मंथन से जो राजनीति निकले उसे ग्राह्यता और दृश्यता के फेर में पड़े बिना, जनता के सामने पेश करें जिसमें जनता एक मसीहा से कुछ पाने की उम्मीद न करे, वह खुद बदले और देश बदलने को तैयार रहे। लोगों का सोच बदले बिना देश नहीं बदलेगा, यह धारणा पहले भी सही थी, और आज भी सही है। इस राजनीति का रास्ता लंबा होगा लेकिन आपके राजनीतिक गुरु किशनजी और सुनीलजी ‘शॉर्टकट’ के विरोधी थे- दोनों ने गुमनामी में रह इस राजनीति को अपनी जिंदगी दे दी। आशा है, आप इस बार शार्टकट नहीं अपनाएंगे!
अनुराग मोदी, कोठी बाजार, बैतूल

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