Jansatta Editorial: Aahar Par Prahar - Jansatta
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आहार पर प्रहार

विष्णु नागर की टिप्पणी ‘आहार का चुनाव’ (दुनिया मेरे आगे, 11 दिसंबर) बड़ा ही रोचक और संतुलित है। नागरजी का यह विचार बिल्कुल ठीक है कि आहार का चुनाव बिल्कुल व्यक्तिगत है और प्राय: यह सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाता है। शाकाहार और मांसाहार की सापेक्षिक उपयोगिता और श्रेष्ठता अकादमिक […]

Author December 22, 2014 12:02 PM

विष्णु नागर की टिप्पणी ‘आहार का चुनाव’ (दुनिया मेरे आगे, 11 दिसंबर) बड़ा ही रोचक और संतुलित है। नागरजी का यह विचार बिल्कुल ठीक है कि आहार का चुनाव बिल्कुल व्यक्तिगत है और प्राय: यह सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाता है। शाकाहार और मांसाहार की सापेक्षिक उपयोगिता और श्रेष्ठता अकादमिक बहस का विषय तो हो सकती है, लेकिन इसे सामाजिक या राजनीतिक रंग देना निश्चय ही फासिस्ट प्रवृत्ति का परिचायक है और वर्तमान में इसे राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।

इस संदर्भ में निरालाजी के जीवन का एक प्रसंग याद आता है, जब वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के फैजाबाद अधिवेशन में गए थे। वहां भोजनालय में लिखा था ‘यहां मांसाहार मना है’। निरालाजी ने इस पर कठोर आपत्ति की और कहा कि यह हिंदी साहित्य का सम्मेलन है या आर्य समाज का। उन्होंने वहीं पर मांस मंगाया और जिनको निशाना बनाया गया था उनको साथ में लेकर खाया।

’आनंद मालवीय, इलाहाबाद

 

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