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किस राह

लोग नगदी न रहने के कारण अपनी जरूरत की चीजें अपने घर में रखे अनाज से अदला-बदली कर काम चलाने को मजबूर हो गए हैं।

Author December 28, 2016 01:58 am
दो हजार रुपये के नोट।

विमुद्रीकरण की मार के चलते जहां शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार से हाथ धो बैठे बहुत सारे लोग अपने गांवों को लौट गए हैं, वहीं गांवों में इसकी वजह से पैदा हुए नगदी के अभाव ने अपने बचपन के दिनों में पचास साल पहले देखी वस्तु-विनिमय की प्रणाली को फिर से सजीव कर दिया है। लोग नगदी न रहने के कारण अपनी जरूरत की चीजें अपने घर में रखे अनाज से अदला-बदली कर काम चलाने को मजबूर हो गए हैं। मोदी बार-बार यह जताने का जतन करते हैं कि वे ऐसा कठिन काम कर रहे हैं, जो उनसे पहले सत्तर साल में कोई नहीं कर पाया। लेकिन हकीकत यह है कि वे वस्तु-विनिमय के दौर में वापस ले जाकर हमारे देश को दशकों पीछे धकेल रहे हैं। वे अपने समर्थकों से चाहे जितना जोर से जयकारा लगवा लें या मीडिया से चाहे जितना हुंकारा भरवा लें, गर्त की ओर जाती हमारे देश की अर्थव्यवस्था में संभाल के आसार निकट भविष्य में दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आते।

जिस सिरफिरेपन की झोंक में जनता के सामने आने वाली परेशानियों का अंदाजा लगाए बिना, उनके उपाय किए बिना, जिस हड़बड़ाहट में नोटबंदी का फैसला किया गया, अब उसके नासूरी रूप में फूट पड़ने के बाद अब ‘ठंडे छींटे’ यह कहना पड़ रहा है कि भले अभी तकलीफ है, लेकिन भविष्य अच्छा होगा। वे आज भी मर्ज का इलाज नहीं कर उसे डांपने के चक्कर में उसे संक्रमित विषाणु में बदल रहे हैं जो आगे चल कर हमारी अर्थव्यवस्था के लिए विनाषी सिद्ध होगा। अपनी आलोचनाओं पर ध्यान देने के बदले वे आलोचकों का उपहास उड़ा कर जले पर नमक छिड़क रहे हैं। साठ फीसद अनपढ़ लोगों के बीच कैशलेस व्यवस्था कैसे लागू होगी? राहुल गांधी के सवाल का जवाब न देकर सिर पर नाटकीय अंदाज में हाथ घुमा कर खिल्ली उड़ाते हुए मोदी ने कहा कि ‘बोलने से पहले लोग सोचते ही नहीं’! जैसे वे कहना चाह रहे हों कि अकेले वे ही सोचते हैं!

इसी तरह राहुल के एक डायरी के हवाले से मिले धन पर उठाए गए सवाल से कन्नी काट कर नाटकीय अंदाज में यह कहना हैरान कर गया कि अच्छा हुआ युवा नेता ने बोलना सीख लिया, देश भूकम्प से बच गया! जबकि राहुल ने बड़ी सौम्यता से जवाब दिया कि मेरा चाहे जितना मजाक उड़ा लें, लेकिन मेरे सवालों का जवाब दे दें…! नोटबंदी अब नगदबंदी बन कर मुद्रा के अकाल में बदल गई, लेकिन प्रधानमंत्री इस पर सवाल उठाने वालों पर जहां अपनी सभाओं में तंज कसते नजर आते हैं, वहीं उनके कथित प्रवक्ता ‘देशद्रोही’ के विश्लेषण से उन्हें लांछित करते और दुत्कारते नजर आते हैं। पीड़ितों के घाव पर मरहम लगाने के बदले ‘नमक छिड़कने’ का यह अंदाज लोकतंत्र में भारी भी पड़ सकता है।

हो सकता है कि पार्टी के भीतर से अभी मोदी के लिए कोई चुनौती नहीं है। इसका अभाव अधिनायकत्व को हवा दे रहा है। भूमि अधिग्रहण के लिए तीन बार लाए गए अध्यादेशों और श्रमिक विरोधी कानूनी बदलावों से पूंजीपरस्ती हुक्मरान की छवि बनी हुई है, उसे नोटबंदी के बहाने कालेधन पर कथित प्रहार के प्रचार से धोया नहीं जा सका है, बल्कि सौ से अधिक लोगों के नोटबंदी के शिकार हो मौत के मुंह में चले जाने से वह और अधिक डरावनी हो गई है।
’रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

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