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दलितों के साथ

आए दिन हो रहे अत्याचार से आज देश में दलित समाज खुद को असुरक्षित महसूस कर दहशत में जी रहा है। आंकड़ों की बात करें तो देश में हर घंटे किसी दलित की बेटी की इज्जत लूटी जा रही है..

Author नई दिल्ली | October 27, 2015 10:55 PM

आए दिन हो रहे अत्याचार से आज देश में दलित समाज खुद को असुरक्षित महसूस कर दहशत में जी रहा है। आंकड़ों की बात करें तो देश में हर घंटे किसी दलित की बेटी की इज्जत लूटी जा रही है, किसी की हत्या हो रही है, किसी का घर जलाया जा रहा है। फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव की दिल दहला देने वाली घटना ने देश की व्यवस्था पर बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए हैं। यह कोई पहली घटना नहीं है। भारत के इतिहास में ऐसी हजारों घटनाएं दर्ज हैं। बिहार के लक्ष्मणपुर बाथे, बथानी टोला, शंकरबिगहा, हरियाणा में हरसौला, गोहाना, मिर्चपुर, बगना, दुलीना, पबनावा आदि ऐसी सैकड़ों घटनाएं हैं जो अभी तक लोगों के दिमाग और जुबान से उतरी नहीं हैं। इसके अलावा ऐसी कितनी ही घटनाएं गांवों में होती हैं जिनका फैसला रसूख रखने वाले चौधरियों के तुगलकी फरमानों से होता है, जिनमें दलितों को दबाया जाता है।

सदियों से दलित समाज को जानबूझ कर हाशिये पर रखा गया है, उससे भेदभाव किया गया है, उसे तरह-तरह से सताया गया है। ऐसे ग्रंथ लिखे गए हैं जिनमें दलितों को ‘नीच’ तक कहा गया है। आखिर कब तक हमारे नेता सुनपेड़ जैसी घटनाओं को अपनी राजनीति का हथियार बनाते रहेंगे? आज भी प्रभावशाली लोग अपने रसूख से न्याय प्रणाली को प्रभावित कर रहे हैं। अगर अपवादों को छोड़ दें तो शोषित और गरीब दलित को न्यायिक व्यवस्था से अधिकतर निराशा ही मिली है। भगाना की घटना कोई भूला नहीं है। एक गरीब आदमी पुलिस थाने जाने का साहस तक नहीं जुटा पाता है क्योंकि उसके दिमाग में पुलिस का भी डर बैठा हुआ है। नतीजतन, दलितों का इस व्यवस्था से भरोसा उठ रहा है।

आज गांव का अधिकतर दलित तबका सवर्णों के खेतों में काम करके अपनी आजीविका चला रहा है। वहआत्मनिर्भर नहीं है और न दलितों के पास ऐसे कोई संसाधन हैं जिनसे अपनी आजीविका चला सकें। हर रोज वे खेतों, स्कूलों, मंदिरों, कॉलेजोंं, नौकरियों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर इस जातीय भेदभाव के कारण अपमानित हो रहे हैं। सुनपेड और पबनावा जैसी घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन दबंग जातियों का मनोबल कौन से आसमान पर है।

दलित गांवों में स्वर्णों की गलियों से गुजरते हुए आज भी झिझकते हैं। लेकिन ये दबंग सरेआम उनकी गलियों और बस्तियों में घुस कर सामूहिक हमले करते हैं। घरों में आग लगाते हैं। पबनावा के लोग आज भी दहशत में जी रहे हैं। सब जानते हैं कि वहां किस तरह सैकड़ों दबंगों ने सोते हुए दलितों पर हमला किया था। आज भी उनके बच्चों को स्कूलों में पीटा जाता है, उनकी बेटियों के साथ छेड़छाड़ होती है। बहुत-से दलित परिवारों ने अपनी बेटियों को रिश्तेदारों के यहां भेज रखा है, उन्हें स्कूलों से निकाल लिया है केवल इस डर से कि कहीं उनके साथ कुछ अनहोनी न हो जाए। आखिर कब तक यह सब होता रहेगा इस देश में? कब तक अपने ही देश में बेगानों की तरह जीते रहेंगे दलित। कब मिलेगा इन्हें बराबरी का दरजा? (रामफल, गांव- दयोरा, कैथल)

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दुरुस्त आयद
महिलाओं ने खुद को हर क्षेत्र में साबित किया है चाहे चिकित्सा हो या नागरिक सेवाएं। वे सभी क्षेत्रों में पुरुषों से आगे निकल रही हैं तो लड़ाकू विमान उड़ाने में कैसे पीछे रह सकती हैं! लिहाजा, बीते दिनों रक्षा मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी है कि अब महिलाएं लड़ाकू विमान भी उड़ा सकेंगी।

पहली बार सशस्त्र सेनाओं में महिलाओं को युद्धक भूमिकाओं में रखा जाएगा और जून 2017 से वे लड़ाकू विमान उड़ा सकेंगी। वायुसेना में महिलाओं की नियुक्तियांजून 1993 से शुरू हुई थीं। अब पूरे 24 साल बाद उनके लिए लड़ाकू विमानों का कॉकपिट भी खोलने का रक्षा मंत्रालय का निर्णय सराहनीय है। यह निर्णय देश की तरक्की में सहायक होगा। इससे महिलाओं को रोजगार के साथ ही अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलेगा। (पूजा यादव, भोपाल)

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भीड़-तंत्र
बिहार विधानसभा चुनाव में फिल्म अभिनेता के साथ भीड़ का बर्ताव आश्चर्यजनक नहीं है। भीड़ में बल होता है और जब भीड़ की आकांक्षा के विपरीत कुछ होता है तो वह आक्रोशित हो उठती है, फिर चाहे उसके सामने लोकप्रिय फिल्म अभिनेता ही क्यों न हो।

भारत के संदर्भ में यह और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां की राजनीति कई अर्थों में भीड़ तंत्र से ही संचालित होती है। यहां भीड़ की स्वीकृति ही सत्ता या लोकप्रियता की गारंटी है और भीड़ का इनकार एक प्रकार का बहिष्कार। इसलिए भीड़ के सामने अपना सम्मोहन बनाए रखना है तो उसके मनोविज्ञान से चलना सीखें नहीं तो भीड़ अपनी भड़ास का शिकार बना लेगी!
(सुयश मिश्र, नई दिल्ली)

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बदहाल किसान
मध्यप्रदेश को सोयाबीन की खेती में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है लेकिन अब हालत यह है कि इसकी खेती जी का जंजाल बनती जा रही है। इसमें 4.80 लाख टन का घाटा हो रहा है। सरकार इस घाटे के कारण कुछ मुआवजा देती है पर यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान होता है। इससे किसानों की लागत की पूर्ति तक नहीं हो पाती, जीवन यापन का सहारा तो दूर की बात है। नतीजतन, किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। यदि सरकार क्षति पूर्ति कर दे तो क्या वह किसी किसान की जान वापस ला सकती है?

मौसम की अदला-बदली और बेरुखी भी किसानों की मौत का कारण बन रही है। सोयाबीन के लिए उचित तापमान वैसे तो 30 डिग्री माना जाता है, लेकिन प्रदेश में यह 35-37 डिग्री तक जा रहा है। ऐसे में जाहिर है कि सोयाबीन को नुकसान होना ही है। बारिश का हाल यह है कि कभी हद से ज्यादा हो जाती है तो कभी न बादल गरजते हैं, न बरसते। इसके मद्देनजर राज्य सरकार को सोयाबीन की खेती के मामले में कुछ रणनीति तैयार करनी चाहिए ताकि उसकी पैदावार बढ़े और किसान आत्महत्या करने पर मजबूर न हों। (अंजलि चंदेल, बैतूल)

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