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चौपाल: परिणाम पर सवाल

इस घटना के बाद सैकड़ों छात्र छला हुआ महसूस करते हुए पुन: आक्रोशित हैं और आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जा रही है। ये वे छात्र हैं जो देश के दूर-दराज से पढ़कर जेएनयू पहुंचने में सफल रहे लेकिन जेएनयू में पढ़ने के बाद फिर से वहीं आने में सफल नहीं हो सके।

Author Published on: March 1, 2018 2:47 AM
जेएनयू विश्वविद्यालय (express File Pic)

प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर आए दिन तैरती और डूबती-उतराती सैकड़ों खबरों में एक खास खबर गौरतलब है। जैसा कि प्रवेश विवरणिका में लिखा गया था, 21 फरवरी 2017 को जेएनयू वेबसाइट पर पिछले दिसंबर में हुई प्रवेश परीक्षाओं के परिणामों की घोषणा हुई। इसी आधार पर तमाम अखबारों ने इसे प्रमुखता से खबर बनाया जबकि परीक्षा परिणाम देखने पर सबको निराशा हाथ लगी क्योंकि ‘लिंक’ खुल ही नहीं रहा था। तीन दिनों की ऊहापोह के बाद 24 फरवरी की रात विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर कुछ परिणाम आने लगे। इन्हीं में शामिल था एमफिल हिंदी का परिणाम।

जेएनयू की आधी सदी के इतिहास में यह पहला मौका था जब यहां से एमए पासआउट सभी विद्यार्थियों को लिखित परीक्षा में असफल करार दे दिया गया। बारह सीटों के लिए आए परिणामों में महज चार प्रत्याशियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया है। ये चारों विद्यार्थी जेएनयू के नहीं हैं। इस घटना के बाद सैकड़ों छात्र छला हुआ महसूस करते हुए पुन: आक्रोशित हैं और आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जा रही है। ये वे छात्र हैं जो देश के दूर-दराज से पढ़कर जेएनयू पहुंचने में सफल रहे लेकिन जेएनयू में पढ़ने के बाद फिर से वहीं आने में सफल नहीं हो सके। परिणाम ने जहां एक बड़ी प्रशासनिक चूक की ओर इशारा किया है तो मूल्यांकन प्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिया है।

आखिर ऐसा क्या हो गया कि यहीं के पढ़े विद्यार्थी यहीं के शिक्षकों के बनाए प्रश्नपत्र को हल नहीं कर सके और अपने ही शिक्षकों की बनाई मूल्यांकन समिति के आगे फेल हो गए? इस परिणाम में सत्यता संदिग्ध है क्योंकि कुछ छात्र असफल हो सकते हैं लेकिन जब सभी छात्र रिजल्ट में औंधे मुंह गिरें तब एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। पीएनबी घोटाले और ओरिएंटल बैंक घोटाले की खबरों के बाद इसे सुनकर भी जरा चौंक जाइए। चौंकिए देश के नामी विश्वविद्यालय की साख के अचानक धड़ाम से गिर पड़ने पर। संदेह कीजिए, विश्वविद्यालय प्रशासन में बैठे लोगों की नीयत पर जिनके कारण ऐसी स्थिति पैदा हुई है। कहीं यह बड़ा घोटाला तो नहीं!

’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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