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चौपाल: गांधी के मूल्य व सुस्ती के पीछे

र्कशील व्यक्ति भी यदि गांधी को भला-बुरा कहे तो आत्मग्लानि का शिकार हो जाता है।

Author देश में आर्थिक सुस्ती के पीछे ये है कारण, जानिए इसके पीछे कौन! | Published on: December 3, 2019 2:56 AM
भाजपा भी जानती है कि गांधी का क्षणिक विरोध कर वह एक जमात को अपने पक्ष में तो कर सकती है।

चौपाल: गांधी के मूल्य व सुस्तमहात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे में दक्षिणपंथ की कट्टर सनक थी, बावजूद इसके संघ या भाजपा ने हाल के वर्षों में गांधी-विरोध या गोडसे का पक्ष नहीं लिया। कारण स्पष्ट है कि गांधी इस देश के जेहन में रचे-बसे हैं। हमारी राजनीति और इसके नुमाइंदों की वैचारिकता चाहे जितनी निकृष्ट हो जाए लेकिन राहत की बात है कि महात्मा गांधी की शहादत के इकहत्तर साल बाद भी, किसी सरकार या किसी पक्ष की इतनी हैसियत नहीं कि राष्ट्रपिता गांधी का खुलेआम विरोध कर उस पर कायम रह जाए।

तर्कशील व्यक्ति भी यदि गांधी को भला-बुरा कहे तो आत्मग्लानि का शिकार हो जाता है। भाजपा भी जानती है कि गांधी का क्षणिक विरोध कर वह एक जमात को अपने पक्ष में तो कर सकती है, लेकिन वह समर्थन अल्पकालिक ही होगा जिसके चलते एक बड़ा जनाधार उससे दूर चला जाएगा। कट्टरता, भेदभाव, नफरत, हिंसा, अतिवाद और द्वेष का जहर कितना ही लोगों के मन में भर दिया जाए, लेकिन अहिंसा, सत्य, भाईचारा, सौहार्द, प्रेम की मानवीय वृत्ति से आमजन स्थायी तौर पर दूर नहीं हो सकता। गांधी इसी मानवता के पर्याय थे, व्यावहारिक और स्वाभाविक थे। आज देश-दुनिया में गांधी के विचार, उनके सिद्धांत, नजरिया, सोच पढ़ाई जाती है। पांच बार शांति के नोबेल के लिए नामित होने वाले महात्मा गांधी को वह पुरस्कार न दिया जाना आज भी नोबेल कमेटी को अखरता है।

बड़ी संजीदगी से असहमति का सम्मान करने और हर भावना व राय को व्यक्त करने के अधिकार के समर्थक गांधी स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर व हर तरह के भेदभाव के घोर विरोधी थे। निर्भीकता से सत्य कहने और उस पर अड़े रहने का साहस गांधी देते हैं। अपने व्यक्तित्व से ही गांधी आजीवन असत्य, घृणा और नफरत को हराते रहे। यही कारण है कि आज गांधी के न होने पर भी झूठ के सहारे उनका प्रतिकार करने की प्रवृत्ति नहीं टिक पा रही है। वे बंदूक की गोली से मरने वाले शख्स हरगिज नहीं थे।
’कृष्ण जांगिड़, राजस्थान विश्वविद्यालय

सुस्ती के पीछे

देश में आर्थिक सुस्ती के कारण किसी से छिपे नहीं हैं। इन कारणों में सबसे चिंताजनक यह तथ्य सामने आना है कि उपभोक्ता खर्च कम हो रहा है। यह कमी शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में हो रही है। इसका मतलब है कि लोग भविष्य को लेकर आशंकित हैं और बचत करना पसंद कर रहे हैं। इससे इनकार नहीं कि बीते दो-तीन महीनों में सरकार एक के बाद एक करीब दो दर्जन कदम उठा चुकी है। इनमें कुछ कदम ऐसे रहे जिन्हें क्रांतिकारी कहा गया, जैसे कॉरपोरेट कर की दरों में व्यापक कटौती। इस कटौती से कॉरपोरेट जगत को प्रोत्साहन तो मिला है, लेकिन इस तथ्य को ओझल नहीं कर सकते कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जो भी कदम उठाए गए हैं, वे आपूर्ति बढ़ाने वाले हैं। लिहाजा, सरकार को कुछ ऐसे उपाय भी करने चाहिए जिनसे मांग बढ़े। यह तभी होगा जब उपभोक्ता अपना खर्च बढ़ाएंगे। उचित होगा कि कॉरपोरेट कर में कटौती के बाद व्यक्तिगत आयकर दरों में कटौती करने के साथ अन्य वे उपाय किए जाएं, जिनसे लोग खपत बढ़ाने को प्रेरित हों।

’हेमंत कुमार, गोराडीह, भागलपुरी के पीछे

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