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चौपाल: स्वागतयोग्य सिफारिश

अगर लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू कराने का सुप्रीम कोर्ट का फरमान सौ प्रतिशत मान लिया जाता, तो यह सिफारिश करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

Author April 23, 2018 03:46 am
बीसीसीआइ की प्रतीकात्मक तस्वीर।

विधि आयोग ने सरकार से सिफारिश की है कि बीसीसीआई यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को सूचना अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में लाया जाए। यह सिफारिश स्वाहत-योग्य है। पर इसे लागू करना आसान नहीं हो सकता। दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड आज तमाम राजनीतिक दलों का दुलारा है। विचारधारा भले अलग-अलग हो, तमाम राजनीतिक बोर्ड के भीतर आने के लिए छटपटाते हैं। ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि बोर्ड आरटीआई के दायरे में आए, क्योंकि जिस दिन ऐसा हो गया, उस दिन से कोई भी बोर्ड के कामकाज और फैसलों को लेकर सूचना मांग सकता है, और कानूनन उस जानकारी को मुहैया कराने से मना नहीं किया जा सकता। वैसी सूरत में बोर्ड पर काबिज लोग अपनी मनमानी कैसे चला सकेंगे? अगर लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू कराने का सुप्रीम कोर्ट का फरमान सौ प्रतिशत मान लिया जाता, तो यह सिफारिश करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। हमने देखा किस कदर पूरा का पूरा महकमा कोर्ट के आदेश को गोल-गोल घुमाता रहा। जिस संस्था में राजनीतिकों का बोलबोला होगा उसका बाल भी बांका कोई कानून नहीं कर सकता। हां जिस दिन बोर्ड कंगाल हो जाएगा, इस पर हर कानून लागू हो जाएगा।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

सीरिया का सवाल
अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने सीरिया पर हमला करके क्या हासिल किया? उनका दावा है कि मिसाइलों से किए गए हमले में सीरिया के रासायनिक हथियरा नष्ट कर दिए गए। जबकि रणनीतिक मामलों के जानकार बताते हैं कि हमले की भनक रूस के पास मौजूद खुफिया सूचनाओं से सीरिया को पहले ही लग गई थी और उसने अपने रासायनिक हथियार हटा कर कहीं और रख लिये थे। अगर यह बात सही हो, तो फिर हमले का हासिल कुछ भी नहीं रहा, सिवाय अपनी चौधराहट दिखाने के। अगर अमेरिका, ब्रिटेन को पक्का भरोसा था कि बशर अल-असद की सरकार द्वारा अपने घरेलू विद्रोहियों के खिलाफ रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए जाने का उनका आरोप सही है, तो उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की जांच पूरी होने और रिपोर्ट आने तक इंतजार क्यों नहीं किया। फिर, किसी देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का अधिकार उन्हें कैसे है? सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र क्या कर रहे हैं? क्या अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की निगाह में इन वैश्विक संस्थाओं की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है, या इन्हें वे अप्रासंगिक बनाने पर तुले हुए हैं? इराक पर भी विनाशकारी हथियार होने का आरोप लगा कर अमेरिका ने हमला बोला था। उस आरोप को अमेरिका कभी साबित नहीं कर पाया। उसने सद््दाम हुसैन को तो तबाह कर दिया, पर खुद भी इराक में उलझ गया और पूरे इलाके को आतंकवाद में उलझा दिया। विडंबना यह है कि सीरिया के मसले पर कोई निष्पक्ष पहल नहीं दिख रही है जो प्रभावी भी हो।
’सुधांशु तिवारी, इंदिरापुरम्, गाजियाबाद


महाभियोग या पैंतरा
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए सात विपक्षी दल, कांग्रेस की अगुआई में एकजुट हुए हैं। लेकिन इस प्रस्ताव को लेकर कांग्रेस में आपस में ही मतभेद है। संसद में पहले भी कई जजों के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन कोई भी प्रस्ताव अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सका। और इस प्रस्ताव को लेकर भी इतिहास दोहराने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं!
’अभिषेक मालवीय, नोएडा

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