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चौपाल: दोहरा मापदंड, जमीनी हकीकत

चुनाव आयोग वर्षों से आपराधिक मामलों में लिप्त नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने और ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द करने की सिफारिश कर रहा है पर न तो सरकार कोई कदम उठा रही है और न चुनाव आयोग को पर्याप्त अधिकार दे रही है।

Author March 7, 2018 3:53 AM
समाज सेवी अन्ना हजारे।(फाइल फोटो)

दोहरा मापदंड
सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे ने कहा है कि चुनाव चिह्न खत्म करने से हमारे देश में लोकतंत्र मजबूत होगा। जिस मुल्क की तीस फीसद जनता निरक्षर हो वहां दरअसल चुनाव चिह्न खत्म करना तो उन तीस फीसद लोगों को मताधिकार से वंचित करने जैसा है। लोकतंत्र सशक्त कानून और सक्रिय जनता व व्यापक जन भागीदारी के जरिए ही मजबूत हो सकता है। लेकिन हमारे देश में अपारदर्शी चुनावी चंदा लोकतंत्र को लगातार कमजोर बना रहा है। चुनावी बांड में भी चंदा देने वाले की पहचान छुपाई गई है। सरकार ने अत्यंत आवश्यक सामग्री- जैसे यूरिया खाद- खरीदने के लिए तो आधार कार्ड अनिवार्य बना कर दिया लेकिन जिस चुनावी चंदे के कारण लोकतंत्र पर सवाल खड़े हो रहे हैं वह चंदा देने वालों के लिए आधार कार्ड क्यों न अनिवार्य हो? इस बाबत चुनाव आयोग को पूर्ण अधिकार न मिलना भी लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न लगाता है। चुनाव आयोग वर्षों से आपराधिक मामलों में लिप्त नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने और ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द करने की सिफारिश कर रहा है पर न तो सरकार कोई कदम उठा रही है और न चुनाव आयोग को पर्याप्त अधिकार दे रही है। विडंबना देखिए कि भारत में एक लिपिक भी स्वच्छ छवि वाला होना चाहिए पर जनता का प्रतिनिधित्व और नेतृत्व करने वालों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। जब भारत में एक लिपिक 58 या 60 वर्ष बाद अपना कार्य करने में सक्षम नहीं माना जाता और रिटायर कर दिया है तो एक राजनेता कब्र में पैर डाल कर भी जनता का नेतृत्व करने में सक्षम कैसे हो सकता है? यह दोहरा मापदंड क्यों? लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव हों। इसके लिए पारदर्शी चुनावी चंदा और स्वतंत्र चुनाव आयोग की आवश्यकता है।
’गंगाधर तिवारी, लखनऊ

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जमीनी हकीकत
पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणाम देख कर सभी विपक्षी दलों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। कांग्रेस को अपने अंदर लोकतंत्र बहाल करके आत्ममंथन करना चाहिए कि उसकी आगे की दिशा क्या होगी, किस एजेंडे को लेकर चलेगी? अब तक पूर्वोत्तर राज्यों में कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच सत्ता परिवर्तन होता रहता था। उस क्रम को भाजपा ने शानदार ढंग से तोड़कर खुद को स्थापित कर लिया है। यह सब कांग्रेस और वामपंथी दलों की नीतियों की वजह से हुआ है। जमीनी हकीकत से मुंह मोड़ना और किसी भी राज्य पर अपना परंपरागत अधिकार समझना आज के समय में किसी राजनीतिक दल की भारी भूल है। इसके उदाहरण उत्तर प्रदेश जैसे सरीखे राज्य हैं। कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों को कहीं भी उपचुनाव या स्थानीय चुनावों में मिली सफलता को लेकर अति आत्मविश्वास से लबरेज होकर नहीं बल्कि जमीनी हकीकत को देखते हुए काम करते रहना होगा। विपक्ष का पतन लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। स्थायी व मजबूत सरकार के साथ मजबूत विपक्ष का होना भी बहुत ही जरूरी है ताकि आम लोगों की आवाज दब न सके।
’मुलायम सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय

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