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चौपाल : परदे का बोझ

आज बच्चों को शिक्षा देने वाली चीजें टीवी से दूर होती नजर आ रही हैं। बाल कथाएं या साहित्य से दूरी बढ़ने का मुख्य कारण टीवी है। लेकिन इस गलती में माता-पिता की सहभागिता बिल्कुल बराबर है, क्योंकि एकल परिवार होने के कारण माता-पिता को अपने बच्चों के लिए थोड़ा भी समय नहीं रह गया है।

पिछले दो दशकों के दौरान टेलीविजन पर चैनलों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। नब्बे के दशक में टीवी पर मात्र दो या तीन ही चैनल आते थे, लेकिन आज उनकी संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और तकनीक के कारण यह सब संभव हो पाया है। लेकिन कुछ सालों में टीवी के नकारात्मक परिणाम आज देखने को मिल रहे हैं, क्योंकि आज बड़ों से लेकर छोटे बच्चे किसी न किसी चैनल पर औसतन चार घंटे बिताते हैं। भारत मे टेलीविजन की शुरुआत का मुख्य उद्देश्य लोगों को जागरूक कर समाज को सही दिशा दिखाना था। लेकिन आज वह उद्देश्य बिल्कुल बदलता नजर आ रहा है, क्योंकि आज का टीवी अश्लीलता, झूठ और गैर-भरोसेमंद चीजों को बढ़ावा देने का माध्यम बनता जा रहा है।

आज बच्चों को शिक्षा देने वाली चीजें टीवी से दूर होती नजर आ रही हैं। बाल कथाएं या साहित्य से दूरी बढ़ने का मुख्य कारण टीवी है। लेकिन इस गलती में माता-पिता की सहभागिता बिल्कुल बराबर है, क्योंकि एकल परिवार होने के कारण माता-पिता को अपने बच्चों के लिए थोड़ा भी समय नहीं रह गया है। बाहरी खेलों से दूरी बढ़ने के कारण उनके मनोरंजन का माध्यम सिर्फ टीवी रह गया है, जिस कारण बच्चे अंधकार के रास्ते जा रहे हैं। भूत-प्रेत के नाटक, साजिश, नशे और चोरी आदि सब चीजें बच्चों के दिमाग पर बहुत असर करती हैं। लेकिन इस बात को आज परिवार के बड़े सदस्य अनदेखा करते हैं। इसी कारण आज बाल अपराध बढ़ते जा रहे हैं।

इसलिए इन चीजों से दूर रखने में माता-पिता को अहम भूमिका निभानी होगी, उन्हें अपने बच्चो एक लिए थोड़ा समय निकालना होगा और समझना होगा। पिछले साल ब्लू वेल गेम से कई बच्चों की मौत हो गई तब जाकर लोगों को समझ में आने लगा कि बच्चों को समय देने का क्या महत्त्व है। बड़ों की तरह बच्चों को भी दिमाग को तरोताजगी रखने के लिए थोड़ा मनोरंजन की आवश्यकता होती है। इसलिए मनोरंजन के तौर पर परिवार और स्कूल में उन्हें बाल कथाए, नाटक, साहित्य, विद्वानों की पुस्तकें और अखबारों में बच्चों के लिए आई कहानी, चित्र जैसी चीजों के प्रति आकर्षित करना चाहिए। उन्हें इन सब चीजों से अवगत कराने और पुराने खेलों को अधिक महत्त्व देने की जरूरत है, क्योकि यही चीजें बच्चों को इन समस्याओं से दूर कर सकती है।
’अखिल सिंघल, द्वारका, नई दिल्ली

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