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चौपाल: दायित्व का तकाजा

उद्योगों ने सीएसआर के मूल उद्देश्यों को समझने में चूक की है। इसका उद्देश्य केवल दान के लिए प्रोत्साहित करना नहीं रहा है बल्कि इसके सहयोग से व्यापक स्तर पर समाज कल्याण है।

Author August 24, 2018 3:10 AM
कारपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) का प्रावधान

नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए चलाए जा रहे सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं में औद्योगिक घरानों की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए 2013 में कंपनी कानून में कारपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) का प्रावधान जोड़ा गया था। इसके जरिए उद्योगों के लिए अपने लाभ में से एक निर्धारित राशि प्रतिवर्ष कारपोरेट सामाजिक दायित्व के अंतर्गत समाज कल्याण के कार्यों में खर्च करना अनिवार्य बनाया गया। कारपोरेट सामाजिक दायित्व को समाज और व्यवसाय के बीच संबंध को बदलने वाले कदम के रूप देखा गया। लेकिन दुर्भाग्य से इस प्रावधान के परिणाम बहुत ज्यादा उत्साहजनक नहीं रहे हैं। सीएसआर की अधिकांश राशि खर्च करने लिए क्षेत्र की परिभाषा तय न होने के कारण ऐसी अनुपयोगी या सुषुप्त मदों में डाल दी जाती है जिनका सीधा और त्वरित उपयोग जनहित के कार्यों में नहीं होता।

2014-15 में 3139 कंपनियों ने सीएसआर की राशि में से 74 प्रतिशत को प्रधानमंत्री राहत कोष में दान कर दिया। इस रकम को खर्च करने में औद्योगिक घरानों द्वारा जरा भी रणनीतिक नवोन्मेषिक विचारशीलता नहीं दिखाई जाती। जहां समाज को आगे बढ़ाने में उद्योग बड़ी भूमिका निभा सकते हैं वहां ये पीछे रह जाते हैं। उद्योगों ने सीएसआर के मूल उद्देश्यों को समझने में चूक की है। इसका उद्देश्य केवल दान के लिए प्रोत्साहित करना नहीं रहा है बल्कि इसके सहयोग से व्यापक स्तर पर समाज कल्याण है। कुछ उद्योग घरानों द्वारा शिक्षा के उत्थान के लिए सीएसआर की राशि ऐसे निजी महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को दी जा रही है जहां पहले से सुविधासंपन्न वर्ग के बच्चे अध्ययनरत हैं। ऐसे संस्थानों तक गरीब वंचित वर्ग के बच्चों की पहुंच दूर-दूर तक नहीं है। यही हाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में सीएसआर की राशि के उपयोग का है। इस क्षेत्र में सीएसआर राशि के इस्तेमाल के नाम पर रकम बड़े-बड़े निजी संस्थानों को दी जा रही है जहां की चिकित्सा और सुविधाओं के खर्चों को वहन कर पाना आम लोगों के लिए असंभव होता है।

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कुछ वर्ष पहले इनफोसिस के नारायणमूर्ति की अध्यक्षता में गठित समिति ने पिछड़े बच्चों तक उच्च शिक्षा पहुंचाने के लिए सीएसआर को उच्च शिक्षा से जोड़ने की सिफारिश तत्कालीन योजना आयोग के सामने रखी थी लेकिन उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। देश के विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थान कोष की कमी से जूझ रहे हैं जहां संसाधनों का भारी अभाव है। मानव संसाधन मंत्रालय को चाहिए कि वह कारपोरेट मामलों के मंत्रालय से मिल कर उचित रूपरेखा तय करे ताकि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सीएसआर की राशि का उचित उपयोग किया जा सके। इस तरह का समन्वय केंद्र और प्रदेश विशेष सभी मंत्रालयों और विभागों के बीच बनाना होगा। सीएसआर के प्रावधानों में आवश्यकतानुसार बदलाव करने होंगे। सीएसआर के यथोचित उपयोग से ही वंचित वर्ग के लोग का जीवन स्तर ऊपर उठाने में सहायता मिलेगी।
’ऋषभ देव पांडेय, जशपुर, छत्तीसगढ़

आप से अलग
आम आदमी पार्टी (आप) के संस्थापकों में से एक आशीष खेतान ने भी पार्टी से किनारा कर लिया। पिछले दिनों आप नेता आशुतोष ने भी पार्टी छोड़ने की घोषणा की थी। इस तरह की खबरें तमाम सुगबुगाहटों को जन्म दे रही हैं। क्या पार्टी में सबकुछ ठीक है? अलग तरह की राजनीति के दावे के साथ सत्ता तक पहुंची आम आदमी पार्टी के भीतर आखिर असंतोष क्यों फैलता जा रहा है? आरंभ में ही योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे प्रमुख चेहरे भी आप से अलग हो गए थे। हालांकि दिल्ली ने आप के आने के बाद कई बदलाव देखे हैं। कुछ नवाचारों को तो जनता ने सराहा भी है लेकिन अंदर का कलह पार्टी को लगातार कमजोर कर देता है। अगर इसी तरह लोग पार्टी से जाते रहेंगे तो आखिर में बचेगा कौन? अगर आम आदमी पार्टी खुद को देश की राजनीति में प्रासंगिक रखना चाहती है तो उसे इस तरह के विघटन और नकारात्मक खबरों को तत्काल रोकना होगा।
’संदीप भट्ट, खंडवा

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