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चौपाल: घोटाले का सबक

विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे लोगों द्वारा किसी निजी बैंक के साथ इतनी बड़ी धोखाधड़ी करने की नौबत ही न आई होती क्योंकि वहां इतनी बड़ी धनराशि जाली दस्तावेजों के आधार पर निकलवाना लगभग असंभव है और यदि वे सफल हो भी गए होते तो संबंधित बैंकों के कई शीर्ष अधिकारी सलाखों के पीछे होते।

Author March 6, 2018 02:44 am
ऊंचे रसूख वाले हीरा कारोबारी नीरव मोदी द्वारा पंजाब नेशनल बैंक के साथ 11400 करोड़ से भी अधिक की धोखाधड़ी ने बैंकों के सार्वजनिक स्वामित्व पर फिर से सवाल उठा दिया है।

यह बहुत चिंताजनक है कि हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक घोटालों के दलदल में गहरे धंसते जा रहे हैं। जिस किसी की भी सत्तासीन राजनीतिकों तक पहुंच हो वह बिना किसी जवाबदेही या गारंटी के करोड़ों-अरबों रुपए के ऋण ले सकता है। बैंकों की लंबे समय से परखी हुई मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया है। निहित स्वार्थों ने हजारों करोड़ रुपए के ऋण देने से पहले किसी भी तरह की जांच-पड़ताल को फिजूल बना कर रख दिया था। सार्वजनिक क्षेत्र की लूटपाट ने गरीब लोगों को भारी कष्ट पहुंचाया है। करदाताओं के जिस पैसे से शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी कल्याणकारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती थीं उसी पैसे को भूखों की तरह डकारने का नतीजा यह हुआ कि अब बैंक भारी-भरकम गैर-निष्पादित संपत्तियों के बोझ तले दबे हुए हैं और सरकार के सामने यह समस्या दरपेश है कि इनका पुन: पूंजीकरण कैसे किया जाए! सरकार ने विरासत में मिली गैर-निष्पादित संपत्तियों का मामला सुलझाने में बहुत सुस्ती से काम लिया है। 2007-08 से लेकर 2012-13 के बीच बैंकों द्वारा दिया गया ऋण 20 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 60 लाख करोड़ के भारी-भरकम आंकड़े तक पहुंच गया।

बकाया न चुकाने वालों की पहचान करना और उन पर शिकंजा कसना कोई आसान काम नहीं। बैंकों के नौ हजार करोड़ रुपए डकारने के बाद विजय माल्या देश से भाग गया। इस प्रकरण ने सरकारी तंत्र का पूरी तरह दिवाला निकाल दिया। ऊंचे रसूख वाले हीरा कारोबारी नीरव मोदी द्वारा पंजाब नेशनल बैंक के साथ 11400 करोड़ से भी अधिक की धोखाधड़ी ने बैंकों के सार्वजनिक स्वामित्व पर फिर से सवाल उठा दिया है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि निजी क्षेत्र के बैंक दूध के धुले हैं। वे भी आम आदमी के हितों की अनदेखी करते हुए अक्सर सत्ता से नजदीकी रखने वाले पूंजीपतियों की लालसा पूरी करते हैं। जब भी किसी प्राइवेट बैंक में घोटाला होता है तो शेयर बाजारों में उसके शेयर की कीमत में भारी गिरावट आने से सबसे अधिक नुकसान प्रोमोटरों को ही होता है।

इसके विपरीत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक किसी के आगे जवाबदेह नहीं क्योंकि सरकार भी करदाताओं के खून-पसीने की कमाई झोंक कर कुप्रबंधन के शिकार बैंकों का उद्धार करने के लिए तत्पर रहती है- बिल्कुल उसी तरह जैसे एयर इंडिया के मामले में किया गया है। स्टेट बैंक आफ इंडिया को छोड़कर अन्य सभी सरकारी बैंकों का अवश्य ही निजीकरण शीघ्रातिशीघ्र होना चाहिए। विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे लोगों द्वारा किसी निजी बैंक के साथ इतनी बड़ी धोखाधड़ी करने की नौबत ही न आई होती क्योंकि वहां इतनी बड़ी धनराशि जाली दस्तावेजों के आधार पर निकलवाना लगभग असंभव है और यदि वे सफल हो भी गए होते तो संबंधित बैंकों के कई शीर्ष अधिकारी सलाखों के पीछे होते। लेकिन पीएनबी के मामले में तो ऐसा लगता है कि दो शीर्ष अधिकारी ही नीरव मोदी के साथ सांठगांठ करते रहे हैं। बैंकिंग क्षेत्र के 70 प्रतिशत कारोबार पर सरकार का कब्जा है। इसके बावजूद एसबीआई को छोड़कर अन्य सभी सरकारी बैंकों का बाजार मूल्य प्राइवेट बैंकों की तुलना में कम है। इस स्थिति का एक ही उपाय है बैंकों का निजीकरण किया जाए और नियामक तंत्र को मजबूत किया जाए।
’विवेकानंद मिश्र, जोगिया, देवरिया, उत्तर प्रदेश

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